Tuesday, 1 September 2015

भारत में इस्लामी आक्रमण एवं धर्मान्तरण का खूनी इतिहास (भाग-२)

भारत में इस्लामी आक्रमण एवं धर्मान्तरण का खूनी इतिहास (भाग-२) । ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ।
५-कुतुबुद्दीन ऐबक (१२०६-१२१०)
हसन निजामी ने अपने ऐतिहासिक लेख ताज-उल-
मासीर में लिखा था, 'कुतुबुद्दीन को अल्लाह ने इस्लाम के शत्रुओं यानी हिन्दुओं-के धर्म के पूर्ण विनाश के लिए नियुक्त किया था, और
उसने हिन्दुओं के रक्त से भारत भूमि को भर
दिया...उसने मूर्ति पूजकों के सम्पूर्ण विश्व को नर्क
की अग्नि में झोंक दिया था...और मन्दिरों और
मूर्तियों के स्थान पर मस्जिदें बनवादी थीं।'
(ताज-उल-मासीर हसन निजामी अनुवाद एलियट और
डाउसन, खण्ड २ पृष्ठ २०९)
'कुतुबुद्दीन ने जामा मस्जिद देहली बनवाई और जिन
मन्दिरों को हाथियों से तुड़वाया था, उनके सोने और
पत्थरों को इस मस्जिद में लगाकर इसे सजा दिया।'
(वही पुस्तक पृष्ठ २२२)
इस्लाम का कालिंजर में प्रवेश
'मन्दिरों को तोड़कर अल्लाह के स्थान मस्जिदों में
रूपान्तरित कर दिया गया और
मूर्ति पूजा का नामोनिशान मिटा दिया गया....पचास
हजार हिन्दुओं को घेरकर बन्दी बना लिया गया और उनके सामूहिक वध के कारण मैदान लाल हो गया।
(उसी पुस्तक में पृष्ठ २३१)
'अपनी तलवार से हिन्दुओं का भीषण विध्वंस कर
भारत भूमि को पवित्र इस्लामी बना दिया, और
मूर्ति पूजा की गन्दगी और बुराई को समाप्त कर दिया,
और सम्पूर्ण देश को मूर्तिपूजा से मुक्त कर दिया, और अपने शाही उत्साह और शक्ति द्वारा किसी भी मन्दिर को खड़ा नहीं रहने दिया।'
(वही पुस्तक पृष्ठ २१६-१७)
५-मुहम्मद बख्तियार खिलजी (१२०४-१२०६)
बख्तियार खिलजी को हिन्दू/बुद्ध
शिक्षा केन्द्रों को खोजने और नष्ट करने में
विशेष रुचि थी। नालन्दा की लूट के विषय में मिन्हाज़ ने
लिखा था-
' बख्तियार बेहर किले के द्वार पर पहुँचा और हजारों काफिरों एवं विद्यार्थियों को मारकर स्थान को अपने
अधिकार में कर लिया। विजेताओं के हाथ लूट का अपार
माल हाथ लगा। निवासियों में अधिकांश नंगे-मुड़े हुए
सिर वाले ब्राहम्ण थे। उन सभी काफिरों का वध कर
दिया गया। वहाँ असंखय पुस्तकें मिलीं और
मुसलमानों ने उन्हें देखा और किसी को बुलाकर
जानना चाहा कि उनमें क्या लिखा है
तो पाया कि वहाँ तो कोई हिन्दू बचा ही नहीं। सभी का वध हो चुका है। जब इस्लाम स्वीकार कर चुके कुछ लोगों को बुलाया तब
उनकी समझ में आया कि वह सारा स्थल काफिरों की शिक्षा का बड़ा स्थान है तो सारे स्थल को जलाकर भस्म
कर दिया। वहाँ इतनी पुस्तकें थीं कि चार महीनों तक जलती रहीं।
(तबाकत-ई-नासिरी, मिन्हाज़-उज़-सिराज, अनु.
एलियट और डाउसन, खण्ड II पृष्ठ ३०६)
७-अलाउद्दीन खिलजी (१२९६-१३१६)
खिलजी दरबार के उस समय के मुस्लिम इतिहास लेखक,
जियाउद्दीन बरानी ने अपने प्रसिद्ध प्रलेख-तारीख-ई-
शाही-में लिखा था, 'सारा गुजरात अलाउद्दीन
की सेना का शिकार हो गया और सोमनाथ की मूर्ति,
जो मुहम्मद गौरी के गज़नी चले जाने के बाद हिन्दुओं ने
पुनः स्थापित कर दी गई थी, को हटाकर दिल्ली ले
आया गया और लोगों के पैरों तले कुचले जाने,
अपमानित किये जाने के लिए मस्जिदों की सीढ़ियों में लगा दी गई।'
(तारीख-ई-फीरोजशाही : जियाउद्दीन बारानी, अनु.
एलियट और डाउसन, खण्ड III पृष्ठ १६३)
'अलाउद्दीन की सेनायें सम्पूर्ण देश के एक क्षेत्र के
बाद दूसरे क्षेत्रों में गईं और विनाश किया। वे अपने
साथ अधिकाधिक दास, काफिरों को धर्मान्तरित किया और हजारों हिन्दू
महिलाओं को पकड़ कर लाये। जिन्हें योद्धाओं के हरम में भेज दिया गया।
गाजी लोग पुनः गुजरात गये
अब्दुल्ला वस्साफ ने अपने इतिहास प्रलेख-तारीख-ई-
वस्साफ-में लिखा था-' उन्होंने कम्बायत को घेर
लिया और मुसलमानों ने इस्लाम के लिए पूर्ण जिहाद किया। निर्दयतापूर्वक
चारों ओर-दायी और बाईं ओर सारी अपवित्र भूमि पर
मूर्तिपूजकों का वध और कत्ल शुरू कर दिये और हिन्दुओं का रक्त मूसलाधार वर्षा की तरह बहा।'
(तारीख-ई-वस्साफ अब्दुल्ला वस्साफ अनु. एलियट
और डाउसन, खण्ड III पृष्ठ ४२-४३)
लूट और मूर्ति भन्जन
जियाउद्दीन बरानी की भाँति अब्दुला वस्साफ ने
भी अल्लाउद्दीन द्वारा सोमनाथ की लूट का विस्तृत
सजीव विवरण लिखा था। अपने प्रलेख में वस्साफ ने
लिखा था-
'उन्होंने सोमनाथ में लगभग बीस हजार सुन्दर सभ्य हिन्दू
महिलाओं को बन्दी बना लिया और अनगिनत बच्चों को, जिनकी संख्या कलम भी लिख भी न सके, भी बन्दी बना लिया....संक्षेप में मुहम्मद
की सेना ने सम्पूर्ण देश का विकराल विनाश किया,
निवासियों के जीवनों को नष्ट किया, शहरों को लूटा;
और उनके बच्चों को बन्दी बनाया, बहुत
से मन्दिरों का विध्वंस किया गया, मूर्तियाँ तोड़ दी गईं
और पैरों के नीचे रौंदी गईं और हजारों को लोगों ने प्राण बचाने के लिए इस्लाम स्वीकार किया।
'
प्रसिद्ध सूफी कवि अमीर खुसरु ने लिखा था-' हमारे
पवित्र सैनिकों की तलवारों के कारण सारा देश एक काँटों रहित जंगल
जैसा हो गया है। हमारे सैनिकों की तलवारों के वारों के
कारण काफिर हिन्दू भाप की तरह समाप्त कर दिये
गये हैं। हिन्दुओं में शक्तिशाली लोगों को पाँवों तले रोंद
दिया गया है। इस्लाम जीत गया है, मूर्ति पूजा हार गई
है, दबा दी गई है।'
(तारीख-ई-अलाई अनु. एलियट और डाउसन, खण्ड
III )
निजामुद्दीन औलिया जो दूर-दूर तक देहली के
सूफी चिश्ती के रूप में विख्यात है, के कवि शिष्य,
अमीर खुसरु, ने अपने प्रलेख-तारीख-ई-अलाई-में
अलाउद्दीन द्वारा दक्षिण भारत में जिहाद का बड़े
आनन्द के साथ विवरण किया है-
'उस समय के खलीफा की तलवार की जीभ,
जो कि इस्लाम की ज्वाला की भी जीभ है, ने सारे
हिन्दुस्तान के सम्पूर्ण अँधेरे को अपने मार्गदर्शन
द्वारा प्रकाश दिया है...दूसरी ओर तोड़े गये सोमनाथ
मन्दिर से इतनी धूल उड़ी जिसे समुद्र भी, भूमि पर
नीचें स्थापित नहीं कर सका; दायीं ओर बायीं ओर,
समुद्र से लेकर समुद्र तक हिन्दुओं के देवताओं
की अनेकों राजधानियों को, जहाँ जिन्न के समय से
ही काफिरों (हिन्दुओं) की शैतानी बस्तियाँ थी, सेना ने जीत लिया है और
सभी कुछ विध्वंस कर दिया गया है। देवगिरी (अब
दौलताबाद) में अपने प्रथम आक्रमण के प्रारम्भ
द्वारा, सुल्तान ने, मूर्ति वाले मन्दिरों के ध्वंस द्वारा,
गैर-मुसलमानों की सारी अपवित्रताओं को समाप्त कर
दिया है और उन्हें इस्लाम में दीक्षित किया है ताकि अल्लाह के कानून के प्रकाश की किरणें इन अपवित्र देशों को पवित्र व प्रकाशित करें,
मस्जिदों में नमाज़ें हों और अल्लाह की प्रशंसा हो।'
(तारीख-ई-अलाई अमीर खुसरु - अनु. एलियट और
डाउसन, खण्ड III पृष्ठ ८५)
बर्नी ने अपने प्रलेख में आगे लिखा कि- 'सुल्तान ने
काजी से पूछा कि इस्लामी कानून में हिन्दुओं
की क्या स्थिति है? काज़ी ने उत्तर दिया, 'ये जाजिया
(टैक्स) देने वाले लोग हैं और जब आय अधिकारी इनसे
चाँदी मांगें तो इन्हें अपनी जान बचाने के लिए पूर्ण विनम्रता, व आदर से सोना देना चाहिए।
यदि अफसर इनके मुँह में थूक फेंकें तो इन्हें उसे लेने के
लिए अपने मुँह खोल देने चाहिए। इस्लाम
की महिमा गाना इनका कर्तव्य है...अल्लाह इन पर
घृणा करता है, इसीलिए वह कहता है, 'इन्हें दास
बना कर रखो।' हिन्दुओं को नीचा दिखाकर रखना एक
धार्मिक कर्तव्य है क्योंकि हिन्दू पैगम्बर के सबसे बड़े
शत्रु हैं और चूंकि पैगम्बर ने हमें आदेश
दिया है कि हम इनका वध करें, इनको लूट लें,
इनको बन्दी बना लें, इस्लाम में धर्मान्तरित कर लें
या हत्या कर दें (कुरान. ९ : ५)। इस पर अलाउद्दीन ने
कहा, 'अरे काजी! तुम तो बड़े विद्वान
आदमी हो यह पूरी तरह इस्लामी कानून के अनुसार
ही है, कि हिन्दुओं को निकृष्टतम दासता और
आज्ञाकारिता के लिए विवश किया जाए...हिन्दू तब
तक विनम्र और दास नहीं बनेंगे जब तक इन्हें
अधिकतम निर्धन न बना दिया जाए।'
(तारीख-ई-फीरोजशाही-बारानी अनु. एलियट और
डाउसन, खण्ड III पृष्ठ १८४-८५)
बारानी की तारीख-ई-फीरोजशाही के संदर्भ में मोरलैण्ड
ने अपने प्रसिद्ध शोध, 'अग्रेरियन सिस्टम इन
मुस्लिम इण्डिया' में लिखा है- 'सुल्तान ने
इस्लामी विद्वानों से उन नियमों और कानूनों को पूछा,ताकि हिन्दुओं को पीसा जा सके,
सताया जा सके, और उनकी सम्पत्ति और अधिकार, सब छीना जा सके।'
(मोरलैण्ड-दी ऐग्रेरियान सिस्टम इन मुस्लिम
इण्डिया एण्ड दी देहली सुल्तनेट, भारतीय विद्या भवन
द्वितीय आवृत्ति पृष्ठ २४)
'
इस सन्दर्भ में बारानी ने लिखा कि जिन हिन्दुओं ने अल्लाह का धर्म इस्लाम स्वीकार नहीं किया अलाउद्दीन ने उन्हें यातनाएँ देकर कत्ल करा दिया और उनके आश्रितों की दशा इतनी हीन, पतित और कष्ट युक्त
बना दी थी, और उन्हें इतनी दयनीय दशा में
पहुँचा दिया था, कि उनकी महिलाएं और बच्चे मुसलमानों के घर भीख माँगने के लिए विवश थे।'
(तारीख-ई-फीरोजशाही और फ़तवा-ई-जहानदारी :
एलियट और डाउसन, खण्ड III)
सभी मुस्लिम शासकों के लिए दास हिन्दुओं की क्रय-
विक्रय सरकारी आय का एक
महत्वपूर्ण स्त्रोत था। किन्तु खिलजियों और
तुगलकों के काल में हिन्दुओं पर इन यातनाओं
का स्वरूप गगन चुम्बी एवं अधिकतम हो गया था।
अमीर खुसरु ने बताया- 'तुर्क जब चाहते थे हिन्दुओं
को पकड़ लेते, क्रय कर लेते अथवा बेच देते थे और उनकी महिलाओं को सुल्तान और उसके अफसरों या सिपहसालारों के हरम में भेज दिया जाता था।
इन यातनाओं से बचने के लिए मस्जिदों के बाहर मुसलमान बनने के लिए हिन्दुओं की कतारें हमेशा लगी ही रहती थी।
(अमीर खुसरु : नूर सिफर : एलियट और डाउसन,
खण्ड III पृष्ठ ५६१)
बरनी ने आगे लिखा कि ' घर में काम अाने वाली वस्तुएँ
जैसे गेहूँ, चावल, घोड़ा और पशु आदि के मूल्य जिस
प्रकार निश्चित किये जाते हैं, अलाउद्दीन ने बाजार में हिन्दू दासों के मूल्य भी निश्चित कर दिये। एक हिन्दू लड़के का विक्रय मूल्य २०-३० तन्काह तय किया गया था। दास लड़कों का उनके कार्यक्षमता के आधार पर वर्गीकरण किया जाता था।
काम करने वाली लड़कियों का मानक सौंदर्य था। अच्छी दिखने वाली स्वस्थ यौवनशील लड़की का मूल्य २०-४० तन्काह, और सुन्दर उच्च परिवार की लड़की का मूल्य एक हजार से लेकर दो हजार तन्काह होता था।'
(बरानी, एलियट और डाउसन, खण्ड III ,हिस्ट्री ऑफ खिलजीज़, के. एस. लाल, पृष्ठ
३१३-१५)
८-मुहम्मद बिन तुगलक (१३२६-१३५१)
भारत के वामपंथी इतिहासकारों ने, बिन
तुगलक का एक सदभावना युक्त अर्धविक्षिप्त, उदार और सुधारक के रूप में बहुत लम्बे काल से,
स्वागत किया है, प्रशंसा की है। नेहरूवादी प्रतिष्ठान कांग्रेस ने तो देहली की एक प्रसिद्ध सड़क का नाम
भी उसकी स्मृति में तुगलक रोड रख दिया।
किन्तु एक विश्व-प्रसिद्ध भ्रमणकर्ता, अफ्रीकी यात्री, इब्न
बतूता, जिसने तुगलक के दरबार को देखा था, ने तुगलक के राज्य के कुछ दृश्यों के बारे में लिखा।
सुल्तान से अपनी पहली भेंट के संदर्भ में, बतूता ने
लिखा था, ५००० दीनार के मूल्य के गाँव, एक घोड़ा,
दस हिन्दू महिला दासियाँ और ५०० दीनार मुझे
अनुदान स्वरूप मिले। (इब्न बतूता : अनुवाद एलियट और
डाउसन, खण्ड III पृष्ठ ५८६)
हिन्दुओं को दास बनाने के काम के कारण बिन तुगलक
इतना बदनाम हो गया था कि उसकी ख्याति दूर-दूर
चारों ओर फैल गई थी कि इतिहास अभिलेखक
शिहाबुद्दीन अल-उमरी ने अपने अभिलेख, 'मसालिक-
उल-अब्सर में उसके विषय में इस प्रकार
लिखा था-' सुल्तान गैर-मुसलमानों (हिन्दुओं) पर युद्ध करने के
अपने सर्वाधिक उत्साह में कभी भी, कोई,
कैसी भी कमी नहीं करता था...हिन्दू
बन्दियों की संख्या इतनी अधिक थी कि प्रतिदिन
अनेकों हजार हिन्दू दास बेच दिये जाते थे।'
(मसालिक-उल-अब्सार : एलियट और डाउसन, खण्ड
III पृष्ठ ५८०)
मुस्लिम हाथों में हिन्दू महिलाओं का उपयोग
या तो काम तृप्ति के लिए था या विक्रय कर धन
कमाने के लिए था। अल-उमरी आगे और कहता है। 'दासों के मूल्यों में कमी होने पर भी युवा हिन्दू लड़कियों के मूल्य बढ़े रहते थे।
(उसी पुस्तक में पृष्ठ ५८०-८१)
इस सन्दर्भ में सुल्तान द्वारा हिन्दुओं को दास बनाये
जाने का इब्नबतूता का प्रत्यक्ष दर्शी वर्णन इस
प्रकार है- ' सर्वप्रथम युद्ध के मध्य बन्दी बनाये गये,
काफिर राजाओं की पुत्रियों को अमीरों और महत्वपूर्ण
विदेशियों को उपहार में भेंट कर दिया जाता था। इसके
पश्चात अन्य काफिरों की पुत्रियों को...सुल्तान अपने भाइयों व सम्बन्धियों को दे देता था।'
(तुगलक कालीन भारत, एस. ए.रिज़वी, भाग १, पृष्ठ
१८९)
हिन्दू सिरों का शिकार
अन्य राजाओं की भाँति बिन तुगलक भी शिकार
को जाया करता था। वह शिकार होती था हिन्दू सिरों का।
इस विषय में इब्नबतूता ने लिखा था- ' तब सुल्तान शिकार के अभियान
के लिए बारान गया जहाँ उसके आदेशानुसार सारे हिन्दू
देश को लूट लिया गया और विनष्ट कर दिया गया।
हिन्दू सिरों को एकत्र कर लाया गया और बारान के
किले की चहारदीवारी पर टाँग दिया गया।'
(इब्न बतूता : एलियट और डाउसन, खण्ड II पृष्ठ
२४२)
९-फिरोज़ शाह तुग़लक (१३५७-१३८८)
फिरोजशाह तुगलक के शासन का वर्णन चार भिन्न-
भिन्न ऐतिहासिक अभिलेखों में लिखा गया है। वे
अभिलेख हैं- १. तारीख-ई-फिरोजशाही, जिआउद्दीन
बारानी, २. तारीख-ई-फिरोजशाही, सिराज अफीफ, ३.
सिरात-ई-फिरोजशाही, फरिश्ता, ४. फुतूहत-ई-
फिरोजशाही, फीरोजशाह तुगलक स्वयं।
हिन्दू महिलाओं का हरम या ज़नानखाना
काम तृप्ति के लिए हिन्दू महिलाओं के दासी बनाये
जाने के विषय में बारानी ने लिखा था- 'फिरोजशाह के
लिए, व्यापक एवम् विविध वर्गों की पकड़ी गई हिन्दू
महिलाओं के जनानखानों में नियमित रूप से जाना उसकी दिनचर्या का हिस्सा था।'
(तारीख-ई-फिरोजशाही, जिआउद्दीन बारानी, एलियट
और डाउसन, खण्ड III)
ताजरीयत-अल-असर के अनुसार 'मुस्लिम
आक्रमणकर्ताओं द्वारा भगाई हुई हिन्दू महिलाओं के
साथ मात्र शील भंग ही नहीं किया जाता था वरन उनके
साथ अनुपम, अवर्णनीय यातनायें
भी दी जाती थीं जैसे लाल गर्म लोहे
की सलाखों को हिन्दू महिलाओं की योनियों में बलात
घुसा देना, उनकी योनियों को सिल देना, और उनके
स्तनों को काट देना।'
बंगाल में नर संहार
'बंगाल में हार के बदले के लिए, फीरोजशाह ने आदेश
दिया कि असुरक्षित बंगाली हिन्दुओं का अंग भंग कर
वध कर दिया जाए। अंग भंग किये गये प्रत्येक हिन्दू
के ऊपर इनाम स्वरूप एक
चाँदी को टंका दिया जाता था। हिन्दू मृतकों के कटे हुए अंगों की गिनती की गई जो १,८०,००० निकले'
(बारानी, उसी पुस्तक में)
ज्वालामुखी मंदिर का विनाश
फरिश्ता ने आगे लिखा- 'सुल्तान ने
ज्वालामुखी मन्दिर की मूर्तियों को तोड़ दिया, उसके
टुकड़ों को वध की गई गउओं के मांस में
मिला दिया और मिश्रण को तोबड़ों में भरवा कर
ब्राहम्णों की गर्दनों में बँधवा दिया, और प्रमुख
मूर्ति को मदीना भेज दिया।'
(उसी पुस्तक में)
उड़ीसा का विध्वंस
सिरात-ई-फीरोजशाही में फरिश्ता ने लिखा-
'फिरोज़शाह, पुरी के जगन्नाथ मन्दिर में, घुसा,
मूर्ति को उखाड़ा और अपमान कारक स्थान पर रखने
के लिए देहली ले गया। पुरी के पश्चात् फीरोजशाह
समुद्रतट के निकट चिल्का झील की ओर गया।
सुल्तान ने उस पूरे टापू को हिन्दुओं के वध
द्वारा उत्पन्न रक्त से रक्त हौज बना दिया। हिन्दू
महिलाओं को काम तृप्ति के लिए पकड़कर ले जाया गया,
गर्भवती महिलाओं का पहले शील भंग किया गया फिर उनमें से कुछ की आँते
निकालकर वध कर दिया गया ।'
(सीरात-ई-फिरोजशाही फरिश्ता)
इस संदर्भ में यह लिखने योग्य है कि एक अन्य
महत्वपूर्ण सड़क और दिल्ली के क्रिकेट स्टेडियम
का नाम इसी गाजी फिरोज़शाह को सम्मान देने के लिए नेहरू ने इसके के नाम पर रखा है।
to be continued ..in part-3
नोट- इन ऐतिहासिक वर्णनों में एक शब्द भी मेरा नहीं है। ये पूरा वर्णन खुद इन सुल्तानों के नजदीकी इतिहास लेखकों का है जो इनकी विजयों को लेखनबद्ध करने के लिए हमेशा इनके साथ ही रहा करते थे। जिन्हें बाद में एलियट और डाउसन ने अपनी पुस्तक "The history of India as told by its own historians" में अनुवाद किया था।
अपनी पुस्तक के लोकार्पण के समय दोनों ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि इन अमानवीय अत्याचारों के अनुवाद के दौरान उन्हें कई दिनों तक नींद नहीं आयी और कई बार वो रो पड़े थे।

भारत में इस्लामी आक्रमण एवं धर्मान्तरण का खूनी इतिहास (भाग-३)

भारत में इस्लामी आक्रमण एवं धर्मान्तरण का खूनी इतिहास (भाग-३)। ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ। �������������
१०-तिमूर या तैमूरलंग (१३९८-१३९९)
तिमूर ने अपनी जीवनी में लिखा-
'लगभग उसी समय मेरे मन में एक अभिलाषा आयी कि मैं हिन्दुस्तान के काफिरों और मूर्तिपूजकों के विरुद्ध जिहाद प्रारम्भ करूं और उन्हें इस्लाम का पवित्र प्रकाश दिखाऊं। 'इस विषय में मैनें अपने मौलवियों एवं उलेमाओं से मशविरा किया और अपने सिपहसालारों को उनके विरुद्ध जिहाद की आज्ञा दे दी।'
(तिमूर की जीवनी-मुलफुजात-ई-तिमूर : एलियट और
डाउसन, खण्ड III पृष्ठ ३९४-९५)
भाटनिर (जो आजकल राजस्थान के गंगानगर जिले का हनुमान गढ़ है) में काफिरों का नरसंहार ।
'इस्लाम के योद्धाओं ने हिन्दुओं पर चारों ओर से
आक्रमण कर दिया और समय की बहुत छोटी अवधि में ही दस हजार हिन्दुओं के सिर काट दिये गये।
काफिरों के रक्त से इस्लाम की तलवार अच्छी तरह धुल गई और सारा खजाना सैनिकों की लूट का माल हो गया।'
(वही पुस्तक, पृष्ठ ४२१-२२)
सिरसा में नरसंहार
'तिमूर ने आगे लिखा- जब मैंने सरस्वती नदी के विषय
में पूछा, मुझे बताया गया कि उस स्थान के लोग इस्लाम के पंथ से अनभिज्ञ थे। मैंने अपनी सैनिक टुकड़ी उनका पीछा करने भेजी और एक महान युद्ध हुआ।
सभी हिन्दुओं का वध कर दिया गया या धर्मान्तरित कर दिया गया। मारे गये हिन्दुओं की सम्पत्तियाँ ,वस्तुएँ व औरतें मुसलमानों के लिए लूट का माल हो गईं। सैनिक अपने साथ कई हजार हिन्दू महिलाओं और बच्चों को साथ लेकर वापिस लौटे।
इन हिन्दू महिलाओं को इस्लाम के पवित्र योद्धाओं के मध्य बाँट दिया गया और बच्चों को मुसलमान बनाकर श्रमकार्यों में लगा दिया गया।'
(वही पुस्तक, पृष्ठ ४२७-२८)
जाटों का नरसंहार
तिमूर ने लिखा - ' मेरे ध्यान में आया कि ये उत्पाती जाट चींटी की भाँति असंखय हैं और इन जाटों का पराभव (वध) कर देना इस्लाम के लिए आवश्यक है।
मैं जंगलों और बीहड़ों में घुस गया, और दो हजार जाटों का वध कर दिया...उसी दिन
सैय्यद मुसलमानों का एक दल, जो वहीं निकट ही रहता था, बड़ी विनम्रता व शालीनता से मुझसे भेंट करने आया और उनका बड़ी शान से स्वागत किया गया।
(उसी पुस्तक में, पृष्ठ ४२९)
इस संदर्भ में यह बताना आवश्यक हो जाता है कि वहाँ के सैय्यद मुसलमान, अपने पड़ोसी जाटों के साथ न तो तनिक भी सहयोगी हुए, और न उन्होंने उनके साथ कोई भी सहानुभूति ही दिखाई; वरन् अपने मजहब के आक्रमणकारियों, द्वारा जाटों के नरसंहार पर खूब प्रसन्न हुए।
लोनी में चुन चुन कर कत्लेआम
जमुना के उस पार देहली के निकट शहर, लोनी,
की विजय का वर्णन करते हुए तिमूर लिखता है।
' उन्तीस तारीख को मैं पुनः अग्रसर हुआ और जमुना नदी पर पहुँच गया। नदी के दूसरे किनारे पर
लोनी का दुर्ग था। अनेकों राजपूतों नें अपनी पत्नियों और बच्चों को में घरों में बन्द कर आग लगा कर मार दिया; और युद्ध क्षेत्र में आ गये, शैतान की भाँति लड़े, और अन्त में मार दिये गये। दुर्ग रक्षक दल के अन्य लोग भी लड़े, और कत्ल कर दिये गये और बहुत से बन्दी बना लिये गये और धर्मान्तरित कर दिये गये। दूसरे दिन मैंने आदेश दिया कि मुसलमान-बन्दियों को पृथक कर बचा लिया जाए किन्तु गैर-मुसलमानों को तलवार द्वारा कत्ल कर दिया जाए।
मैंने यह भी आदेश दिया कि मुसलमानों के घरों को सुरक्षित रखा जाए, किन्तु अन्य सभी घरों को लूट लिया जाए, और विनष्ट कर दिया जाए।'
(मुलफुज़ात-ई-तिमूरी,अनुवाद एलियट और डाउसन,
खण्ड III पृष्ठ ४३२-३३)
एक लाख असहाय हिन्दुओं का एक ही दिन में कत्ल
हिन्दुओं के वध एवं रक्तपात में उसे कितना आनन्द आता था, इसके विषय में तिमूर ने लिखा -
'अमीर जहानशाह और अमीर सुलेमान शाह और अन्य अनुभवी अमीरों ने मेरे ध्यान में लाया,कि जब से हम हिन्दुस्तान में घुसे हैं तब से अब तक हमने १००००० हिन्दू बन्दी बनाये हैं और उन्होंने इस्लाम स्वीकार नहीं किया वे सभी मेरे डेरे में हैं।
मैंने बन्दियों के विषय में मौलवियों का परामर्श माँगा, और उन्होंने कहा, कि इन बन्दियों को लूट के सामान की तरह छोड़ा नहीं जा सकता; और मैंने इस्लामी युद्ध के
नियमों के अनुरूप सीधे ही सभी डेरों में आदेश दे दिया, कि प्रत्येक व्यक्ति जिसके पास युद्ध बन्दी हैं, उन्हें मृत्यु को सौंप दें ।
इस्लाम के गाजियों को जैसे ही आदेशों का ज्ञान हुआ, उन्होंने बन्दियों को मौत के घाट उतार दिया। १००००० 'अविश्वासी 'अपवित्र मूर्ति पूजक', (हिन्दू) उस दिन कत्लकर दिये गये।
मौलाना नसीरुद्दीन उमर, मेरा एक परामर्श दाता और
विद्वान, जिसने अपने सारे जीवन में जहाँ एक
चिड़िया भी नहीं मारी थी, मेरे आदेश के पालन में, उसने
अपने पन्द्रह हिन्दू बन्दियों का वध कर दिया।
(उसी पुस्तक में, पृष्ठ ४३५-३६)
दिल्ली में चुन चुनकर कत्ल
' महीने की छः तारीख को मैंने देहली को लूट लिया,
ध्वंस कर दिया। हिन्दुओं ने अपने ही हाथों अपने
घरों में आग लगा दी, और अपनी पत्नियों और
बच्चों को उन घरों के भीतर जला दिया, और युद्ध में
दैत्यों की भाँति कूद पड़े, और मार दिये गये...उस दिन
बृहस्पतिवार को और शुक्रवार की पूरी रात्रि को लगभग
पन्द्रह हजार तुर्क, हिन्दुओं का वध करने, लूटने और विनाश कार्य में लिप्त थे...अगले दिन शनिवार को भी पूरे दिन उसी प्रकार का क्रिया कलाप चलता रहा और लूट इतनी अधिक थी कि कोई व्यक्ति ऐसा नहीं था जिसके पास बीस से अधिक पुरूष,महिलाएं और बच्चे बन्दी न हों। और दूसरे प्रकार की लूट भी माणिक, मोती, हीरों के रूप में अथाह व असीमित थी।
औरतें तो इतनी अधिक मात्रा में हाथ लगीं कि गिनती से परे थीं।
उलेमाओं और दूसरे मुसलमानों को छोड़कर और जिन्होंनें इस्लाम स्वीकार किया; को छोड़कर सभी का वध कर दिया गया और सारे शहर को विध्वंस कर दिया।'
(उसी पुस्तक में, पृष्ठ ४४५-४६)
मोहम्मद हबीब और ए. के. निजामी ने, ए कम्प्रीहैन्सिव हिस्ट्री ऑफ इण्डिया, खण्ड ५ दी 'सुल्तानेट्स', (पृष्ठ १२२) पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस ऑफ इण्डिया, नई दिल्ली, पुस्तक में से बन्दी व वध हुए हिन्दू पुरुष,महिला बच्चों सम्बन्धी इस लेख में से 'हिन्दू' शब्द को जानबूझ कर हटा दिया है।
यमुना के किनारे-किनारे जिहाद
तिमूर ने लिखा था- 'जुमादा-ई-अव्वाल के पहले दिन
मैंने अपनी सेना की बाईं ओर के भाग, को अमीर जहाँशाह के नेतृत्व में सौंप दिया और आदेश दे दिया कि यमुना के किनारे-किनारे ऊपर की ओर अग्रसर हुआ जाए और मार्ग में आने वाले प्रत्येक दुर्ग, शहर व गाँव को विजय किया जाए और देश के सभी गैर-मुसलमानों को तलवार से काट दिया जाए...मेरे वीर
अनुयायियों ने आज्ञा पालन किया और शत्रुओं
का पीछा किया और उनमें से बहुतों को मार दिया और
उनकी पत्नियों और बच्चों को बन्दी बना लिया। जब अल्लाह की कृपा से मैंने विजय प्राप्त कर ली। मैं अपने घोड़े से उतर आया और अल्लाह को धन्यवाद देने के लिए भूमि पर लेट गया और साष्टांग प्रणाम किया।
(उसी पुस्तक में, पृष्ठ ४५१-५४)
हरिद्वार के कुम्भ मेले में रक्तपात
तिमूर ने आगे लिखा था-' मेरे वीर आदमियों ने बड़े
साहस और चुनौती का प्रदर्शन किया और गंगा स्नान
के पर्व के अवसर पर हिन्दुओं के वध में परिश्रम
किया, उन्होंने काफिरों में से बहुतों को वध कर दिया और उनका पीछा किया जो पर्वतों की ओर भागे।
उनमें से इतनों का वध किया गया कि उनका रक्त पर्वतों और मैदानों में बहने लगा। इस प्रकार सभी को नर्क की अग्नि में झोंक दिया गया।
(उसी पुस्तक में, पृष्ठ ४५९)
शिवालिक में इस्लाम का प्रवेश
तिमूर ने लिखा-' जुमादा-ई-अव्वाल के
दसवें दिन शिवालिक के काफिरों से युद्ध करने व
उन का वध करने के निश्चय के साथ मैं अपने घोड़े पर
चढ़ा और अपनी तलवार खींच ली। वीर-योद्धाओं ने कट मरे हिन्दुओं के शवों के अनेकों ढेर बना दिये।
पहाड़ी की सभी महिलायें व बच्चे बन्दी बना लिये गये।
अगले दिन मैंने यमुना नदी पार कर ली और शिवालिक
पहाड़ी की दूसरी ओर डेरा लगा दिया।��
इस लूट में सैनिकों को असीमित वस्तुएं और बहुमूल्य पदार्थ, बन्दी, और पशु प्राप्त हुए। उनमें से किसी के पास एक या दो सौ गायों और दस या बीस दासों से कम न थे।'
(उसी पुस्तक में, पृष्ठ ४६२-४६४)
कांगड़ा में जिहाद
'शिवालिक के उस पार घाटी में मैं जैसे
ही घुसा तो हिन्दुओं के एक विशाल शहर, नगर कोट,
के विषय में मुझे सूचना दी गई, तो तुरन्त ही मैंने अमीर
जहाँ शाह को शत्रु पर आक्रमण करने के लिए आदेश
दिया। इस्लाम के पवित्र योद्धाओं ने हाथों में तलवारें
लेकर भगोड़ों के मध्य घुस जाने का साहस दिखाया और
हिन्दुओं की लाशों के ढेर लगा दिये। बहुतांश संख्या में,
वध कर दिये गये, और विजेताओं के हाथ में एक महान
लूट के रूप में विशाल संख्या में, वस्तुएं, बहुमूल्य
पदार्थ व बन्दी आये।'
(वही पुस्तक, पृष्ठ ४६५-६६)
११-बाबर (१५१९-१५३०)
भारत में मुगल साम्राज्य के संस्थापक, बाबर ने उत्तरपश्चिम सीमा प्रान्त के, एक छोटे से राज्य, बिजनौर, में अपनी भारतविजय के प्रारम्भिक काल १५१९ में आक्रमण किया जिसमें उसे मुजाहिद की उपाधि मिली थी। उसने अपनी जीवनी, बाबरनामा, में इस घटना का बड़े आनन्द व हर्षोल्लास, के साथ वर्णन किया था।
'चूंकि बिजौरीवासी इस्लाम के शत्रु व विद्रोही थे, अत: उनका समावेशी नर संहार किया गया। उनकी पत्नियों और बच्चों को बन्दी बना लिया गया।
एक अनुमान के अनुसार तीन हजार व्यक्ति मौत के घाट उतारे गये,नर्क पहुँचाये गये। दुर्ग को विजयकर जब हमने उसमें प्रवेश किया और उसका निरीक्षण किया। दीवालों के सहारे, घरों में, गलियों में, गलियारों में, अनगित संख्या में हिन्दू मृतक पड़े हुए थे। आने वाले व जाने वाले सभी को शवों के ऊपर से ही जाना पड़ा था..
मुहर्रम के नौवें दिन मैंने आदेश दिया कि मैदान में हिन्दू मृतक सिरों की एक मीनार बनाई जाए।
(बाबरनामा अनु. ए. एस. बैवरिज, नई
दिल्ली पुनः छापी १९७९, पृष्ठ ३७०-७१)
बाबर में अपने पूर्वज तिमूर की भांति हिन्दू सिरों की मीनारें खड़ी करने की एक असाधारण लगन थी।
हमारे वामपंथी इतिहासकारों ने बाबर को एक दक्ष,चतुर,
भावुक कवि चित्रित किया है। लेकिन उसी के शब्दों में वो एक महान गाजी (काफिरों का कातिल) था।
'इस्लाम के निमित्त मैं जंगलों में भटका।
मूर्ति पूजकों व हिन्दुओं के विरुद्ध प्रस्तुत हुआ।
शहीद की मृत्यु स्वयं पाने का निश्चय किया,
अल्लाह का धन्यवाद कि मैं गाजी हो गया हूँ।'
(उसी पुस्तक में, पृष्ठ-५७४-७५)
बाबरी मस्जिद
१५२८-२९ में, बाबर के आदेशानुसार, मुगल सैन्य संचालक, मीरबाकी ने, भगवान राम
की जन्मभूमि अयोध्या मन्दिर का विध्वंस कर दिया और एक लाख पचहत्तर हजार हिन्दुओं को मारकर पानी की जगह उनके रक्त को मसाले में मिलाकर उस स्थान पर एक मस्जिद बनवा दी।'
(उसी पुस्तक में, पृष्ठ ६५६, और मुस्लिम स्टेट इन
इण्डिया, के. एस. लाल),
(लखनऊ गजेटियर, लार्ड कनिंघम)
गुरु नानक देव द्वारा बाबर की निन्दा
पंजाब के ऐमनाबाद अंचल में सन १५२२ में बाबर
की सैन्यवाहिनी ने जिस क्रूरता के साथ हज़ारों नागरिकों के सामूहिक कत्ल के साथ सम्पूर्ण अंचल को नष्ट कर उसे मलवे के ढेर में परिवर्त्तित कर दिया उसे देखकर गुरूनानक देव अत्यंत ही द्रवित एवं व्यथित हो उठे।
उसी के परिणामस्वरूप उन्होंने बाबरगाथा नामक
अपनी काव्यकृति की सृष्टि की।
१९ रागों वाले बाबरगाथा में नानकदेव ने लिखा है: बाबर अपने पापों की बरात लेकर हमारे देश पर चढ़ आया है और ज़बर्दस्ती हमारी बेटियों के हाथ माँगने पर आमादा है। धर्म और शर्म दोनों कहीं छिप गये लगते हैं। हमलावर लोग हर रोज़ हमारी बहू-बेटियों को उठाने में लगे हैं ।
हे ईश्वर, क्यों तुमने हिन्दुस्तान को बाबर द्वारा पैदा की गयी आग में झोंक दिया है। तेरे दिल में क्या कुछ भी दर्द नहीं है?
जिन महिलाओं के मस्तक पर उनके बालों की लटें लहराया करती थीं और उन लटों के बीच जिनका सिन्दूर प्रज्ज्वलित और प्रकाशमान रहता था, उनके सिरों को उस्तरों से मूंड डाला गया है और चारों ओर से धूल उड़ उड़ कर उनके ऊपर पड़ रही है। जो औरतें किसी ज़माने में महलों में निवास करती थीं उनको आज सड़क पर भी कहीं ठौर नहीं मिल पा रही है। कभी उन स्त्रियों को विवाहिता होने का गर्व था और पतियों के साथ वह प्रसन्नता के साथ अपना जीवन-यापन करती थीं आज उनके गलों में मोतियों की लड़ियाँ टूट चुकी हैं।
बड़े बड़े राजमहल आग की भेंट चढ़ा दिये गये, राजपुरूषों के टुकड़े-टुकड़े कर उन्हें मिट्टी में मिला दिया गया। जिनकी अर्ज़ियाँ भगवान के दरबार में फाड़ दी गयी हों, उनको बचा भी कौन
सकता है?
(बाबरगाथा और गुरु नानक, पृष्ठ १२५, प्रकाशन विभाग, भारतसरकार)
विजयानगरम् का विनाश (१५६५)
काम्पिल के राजा के पुत्रों, हरिहर और बुक्का द्वारा स्थापित विजया नगरम् अपने समय में पूरे विश्वभर में सर्वाधिक सम्पन्न राजधानियों में से एक थी जो स्वयं में सौन्दर्य एवं कला का एक आश्चर्य ही है। इस हिन्दू राज्य में धन, सम्पदा, संस्कृति और उदार मानव समाज था।
भारत में भ्रमणार्थ आये यात्री, दुआर्ते बारबोसा के शब्दों में,
''विजया नगर के राजाओं ने आज्ञा दे रखी थी कि कोई भी व्यक्ति, कभी भी, कहीं भी आये या जाये; और बिना किसी कैसी भी रुकावट, असुविधा के, स्वेच्छानुसार अपने मतानुसार अपना जीवन यापन करे। उसे यह पूछने या बताने की आवश्यकता नहीं थी कि वह ईसाई, मुसलमान या विधर्मी है। वह जो भी है सुख से स्वेच्छानुसार रहे।
सर्वत्र सभी द्वारा समता, न्याय और
आत्मीयता ही देखने को थी।''
(दुआर्ते बारबोसा की पुस्तक, खण्ड १, पृष्ठ २०२)
उदाहरणार्थ, ''(१४१९-१४४९) में देव राय ने आदेश
निकाला कि मुसलमानों को सेवाओं में रखा जाए, उन्हें
सम्पत्तियाँ आवण्टित कीं, और विजयनगर में मुसलमानों के लिए एक मस्जिद भी बनावाईं।
इसी वंश के राम राजा ने विजयनगर के निकट के मुस्लिम शासक, सुल्तान अली आदिल शाह जिसे कई बार उन्होनें युद्ध में पराजित किया था को उसका राज्य लौटाकर उसके साथ उदारता पूर्वक शांति स्थापित कर ली। जो उनकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई।
सुल्तान ने मूर्ति पूजकों (गैर-मुसलमानों) के साथ धोखाधड़ी कर देने सम्बन्धी कुरानी (३ः११८) आज्ञा का पालन करते हुए दक्षिण भारत की मुस्लिम रियासतों का एक संघ बनाकर, इस राज्य के विरुद्ध जिहाद कर दिया।
२३ जनवरी १५६५ को ताली कोट के यृद्ध के अन्तिम दिन राम राजा के दो मुसलमान सेना नायकों द्वारा धोखा देकर पक्ष त्याग देने के कारण वो जीता हुआ युद्ध हार गये।
कैसर फ्रैडरिक, जिसने उस समय विजय नगर को देखा था, ने कहा था कि इन दोनों सेना नायकों के नेतृत्व में प्रत्येक के अधीन सत्तर से अस्सी हजार योद्धा थे, इनके पक्ष त्याग व धोखा धड़ी के कारण ही विजया नगर की हार हुई।
राम राजा शत्रुओं के हाथ लग गये और हसन के आदेशानुसार उनका सर काट दिया गया।''
(आर. सी. मजूमदार सं. हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ
दी इण्डियन पीपुल, बी वी बी, खण्ड VII पृष्ठ ४२५)
अब्बास खान शेरवानी ने अपने ऐतिहासिक अभिलेख
तारीख-ई-फरिश्ता में लिखा- ' 'पवित्र सेनाओं ने सुल्तान के साथ हिन्दुओं का पीछा किया इतनी मात्रा में कत्ल किया कि रक्त बहने लगा और नदी का पानी रक्त रंजित हो गया।
सर्वश्रेष्ठ अधिकारियों ने गणना की थी कि हजारों अविश्वासी, हिन्दू व्यक्तियों का वध किया गया था। लूटपाट इतनी व्यापक और अधिक थी कि संघीय सेना का प्रत्येक व्यक्ति सोने, जवाहरात, आयुध, घोड़े और दास सभी से बेहद धनी हो गया,
उन्होंने लूटपाट की, प्रत्येक प्रमुख भवन को गिराकर
भूमि सात कर दिया, और हर सम्भव प्रकार
का अत्याचार किा।''
(तारीख-ई-फरिश्ता, अब्बास खान शेरवानी, एलियट
और डाउसन, खण्ड IV, पृष्ठ ४०७-०९)
दार-उल-हरब का विनाश
''तीसरे दिन, अन्त का प्रारम्भ हुआ।
विजयी मुसलमानों ने पूर्ण निर्ममतापूर्वक हिन्दू लोगों को काटा, कत्ल किया, मन्दिरों और पूजा घरों को तोड़ डाला, और अतिसुन्दर राजमहलों का इतनी असभ्यता,
बर्बरता पूर्ण बदले की भावना प्रदर्शित करते हुए विनाश किया कि जहाँ शाही भवन हुआ करते थे उन स्थानों की पहचान के लिए वहाँ अवशेषों के ढेर मात्र रह गये।
ऐसा नहीं लगता था कि उनसे कुछ भी बच पया हो।
आकर्षक एवं महिमा पूर्ण ढंग से सजे भवनों को विनष्ट करने के लिए उन्होंने व्यापक व विशालकाय आग लगा दी, और उनके अनुपम रूप में सुन्दर पत्थर की भवन निर्माण कला का ध्वंस कर दिया।
विश्व के इतिहास में सम्भवत कभी भी ऐसे विनाश का काम नहीं किया गया है। समूचा नगर हिन्दुओं से खाली कर दिया गया जो या तो वध कर दिये गये, पलायन कर गये अथवा इस्लाम स्वीकार कर अपने प्राणों की रक्षा की। समस्त सुन्दर व ऐश्वर्यवान शहर को खण्डहरों में बदल दिया गया, और ऐसे असभ्य, बर्बर, आतंकपूर्ण व यातनापूर्ण वातावरण के मध्य कि उसका वर्णन भी न किया जा सके।''
(रौबर्ट स्वैल : ऐ फौरगौटिन ऐम्पायर, पृष्ठ
१९९-२००, न्यू देहली, पुनः मुद्रित १९६६)
to be continued ..in part-4
नोट- इन ऐतिहासिक वर्णनों में एक शब्द भी मेरा नहीं है। ये पूरा वर्णन खुद इन सुल्तानों के नजदीकी इतिहास लेखकों का है जो इनकी विजयों को लेखनबद्ध करने के लिए हमेशा इनके साथ ही रहा करते थे।
जिन्हें बाद में एलियट और डाउसन ने अपनी पुस्तक "The history of India as told by its own
historians" में अनुवाद किया था।
अपनी पुस्तक के लोकार्पण के समय दोनों ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि इन अमानवीय अत्याचारों के अनुवाद के दौरान उन्हें कई दिनों तक नींद नहीं आयी और कई बार वो रो पड़े थे।

शाहजहाँ के हरम में ८००० रखैलें थीं

''शाहजहाँ के हरम में ८००० रखैलें थीं जो उसे उसके पिता जहाँगीर से विरासत में मिली थी। उसने बाप की सम्पत्ति को और बढ़ाया। उसने हरम की महिलाओं की व्यापक छाँट की तथा बुढ़ियाओं को भगा कर और अन्य हिन्दू परिवारों से बलात लाकर हरम को बढ़ाता ही रहा।''
(अकबर दी ग्रेट मुगल : वी स्मिथ, पृष्ठ ३५९)
कहते हैं कि उन्हीं भगायी गयी महिलाओं से दिल्ली का रेडलाइट एरिया जी.बी. रोड गुलजार हुआ था और वहाँ इस धंधे की शुरूआत हुई थी।
जबरन अगवा की हुई हिन्दू महिलाओं की यौन-गुलामी और यौन व्यापार को शाहजहाँ प्रश्रय देता था, और अक्सर अपने मंत्रियों और सम्बन्धियों को पुरस्कार स्वरूप अनेकों हिन्दू महिलाओं को उपहार में दिया करता था।
यह नर पशु, यौनाचार के प्रति इतना आकर्षित और उत्साही था, कि हिन्दू महिलाओं का मीना बाजार लगाया करता था, यहाँ तक कि अपने महल में भी।
सुप्रसिद्ध यूरोपीय यात्री फ्रांकोइस बर्नियर ने इस विषय में टिप्पणी की थी कि, ''महल में
बार-बार लगने वाले मीना बाजार, जहाँ अगवा कर लाई
हुई सैकड़ों हिन्दू महिलाओं का, क्रय-विक्रय हुआ करता था, राज्य द्वारा बड़ी संख्या में नाचने वाली लड़कियों की व्यवस्था, और नपुसंक बनाये गये सैकड़ों लड़कों की हरमों में उपस्थिती, शाहजहाँ की अनंत वासना के समाधान के लिए ही थी।
(टे्रविल्स इन दी मुगल ऐम्पायर- फ्रान्कोइस
बर्नियर :पुनः लिखित वी. स्मिथ, औक्स
फोर्ड १९३४)
शाहजहाँ को प्रेम की मिसाल के रूप पेश किया जाता रहा है और किया भी क्यों न जाए ,८००० औरतों को अपने हरम में रखने वाला अगर किसी एक में ज्यादा रुचि दिखाए तो वो उसका प्यार ही कहा जाएगा।
आप यह जानकर हैरान हो जायेंगे कि मुमताज का नाम मुमताज महल था ही नहीं बल्कि उसका असली नाम "अर्जुमंद-बानो-बेगम" था।
और तो और जिस शाहजहाँ और मुमताज के प्यार की इतनी डींगे हांकी जाती है वो शाहजहाँ की ना तो पहली पत्नी थी ना ही आखिरी ।
मुमताज शाहजहाँ की सात बीबियों में चौथी थी । इसका मतलब है कि शाहजहाँ ने मुमताज से पहले 3 शादियाँ कर रखी थी और, मुमताज से शादी करने के बाद भी उसका मन नहीं भरा तथा उसके बाद भी उस ने 3
शादियाँ और की यहाँ तक कि मुमताज के मरने के एक हफ्ते के अन्दर ही उसकी बहन फरजाना से शादी कर ली थी। जिसे उसने रखैल बना कर रखा हुआ था जिससे शादी करने से पहले ही शाहजहाँ को एक बेटा भी था।
अगर शाहजहाँ को मुमताज
से इतना ही प्यार था तो मुमताज से शादी के बाद भी शाहजहाँ ने 3 और शादियाँ क्यों की....?????
अब आप यह भी जान लो कि शाहजहाँ की सातों बीबियों में सबसे सुन्दर मुमताज नहीं बल्कि इशरत बानो थी जो कि उसकी पहली पत्नी थी ।
उस से भी घिनौना तथ्य यह है कि शाहजहाँ से शादी करते समय मुमताज कोई कुंवारी लड़की नहीं थी बल्कि वो शादीशुदा थी और, उसका पति शाहजहाँ की सेना में
सूबेदार था जिसका नाम "शेर अफगान खान" था।
शाहजहाँ ने शेर अफगान खान की हत्या कर मुमताज से
शादी की थी।
गौर करने लायक बात यह भी है कि ३८ वर्षीय मुमताज की मौत कोई बीमारी या एक्सीडेंट से नहीं बल्कि चौदहवें बच्चे को जन्म देने के दौरान अत्यधिक कमजोरी के कारण हुई थी। यानी शाहजहाँ ने उसे बच्चे पैदा करने की मशीन ही नहीं बल्कि फैक्ट्री बनाकर मार डाला।
शाहजहाँ कामुकता के लिए इतना कुख्यात था, की कई
इतिहासकारों ने उसे उसकी अपनी सगी बेटी जहाँआरा के साथ स्वयं सम्भोग करने का दोषी कहा है।
शाहजहाँ और मुमताज महल की बड़ी बेटी जहाँआरा बिल्कुल अपनी माँ की तरह लगती थी।
इसीलिए मुमताज की मृत्यु के बाद उसकी याद में लम्पट शाहजहाँ ने अपनी ही बेटी जहाँआरा को फंसाकर भोगना शुरू कर दिया था।
जहाँआरा को शाहजहाँ इतना प्यार करता था कि उसने उसका निकाह तक होने न दिया।
बाप-बेटी के इस प्यार को देखकर जब महल में चर्चा शुरू हुई,
तो मुल्ला-मौलवियों की एक बैठक बुलाई गयी और उन्होंने इस पाप को जायज ठहराने के लिए एक हदीस का उद्धरण दिया और कहा कि - "माली को अपने द्वारा लगाये पेड़
का फल खाने का हक़ है"।
(Francois Bernier wrote, " Shah Jahan used to have regular sex with his eldest daughter Jahan Ara.
To defend himself, Shah Jahan used to say that, it was the privilege of a planter to taste the fruit of the tree he had planted.")
इतना ही नहीं जहाँआरा के किसी भी आशिक को वह उसके पास फटकने नहीं देता था।
कहा जाता है की एकबार जहाँआरा जब अपने एक आशिक के साथ इश्क लड़ा रही थी तो शाहजहाँ आ गया जिससे डरकर वह हरम के तंदूर में छिप गया, शाहजहाँ ने
तंदूर में आग लगवा दी और उसे जिन्दा जला दिया।
दरअसल अकबर ने यह नियम बना दिया था, की मुगलिया खानदान की बेटियों की शादी नहीं होगी। इतिहासकार इसके लिए कई
कारण बताते हैं। इसका परिणाम यह होता था, की मुग़ल
खानदान की लड़कियां अपने जिस्मानी भूख मिटाने के लिए अवैध तरीके से दरबारी, नौकर के साथ साथ, रिश्तेदार यहाँ तक की सगे सम्बन्धियों का भी सहारा लेती थी।
जहाँआरा अपने लम्पट बाप के लिए लड़कियाँ भी फंसाकर लाती थी। जहाँआरा की मदद से शाहजहाँ ने मुमताज के भाई शाइस्ता खान की बीबी से कई बार बलात्कार किया था।
शाहजहाँ के राजज्योतिष की 13 वर्षीय ब्राह्मण लडकी को जहाँआरा ने अपने महल में बुलाकर धोखे से नशा करा बाप के हवाले कर
दिया था जिससे शाहजहाँ ने 58 वें वर्ष में उस 13 बर्ष की ब्राह्मण कन्या से निकाह किया था। बाद में इसी ब्राहम्ण कन्या ने शाहजहाँ के कैद होने के बाद औरंगजेब से बचने और एक बार फिर से हवस की सामग्री बनने से खुद को बचाने के लिए अपने ही हाथों अपने चेहरे पर तेजाब डाल लिया था।
शाहजहाँ शेखी मारा करता था कि ' 'वह तिमूर (तैमूरलंग)
का वंशज है जो भारत में तलवार और अग्नि लाया था।
उस उजबेकिस्तान के जंगली जानवर तिमूर से और उसकी हिन्दुओं के रक्तपात की उपलब्धि से इतना प्रभावित था कि ''उसने अपना नाम तिमूर
द्वितीय रख लिया''
(दी लीगेसी ऑफ मुस्लिम रूल इन इण्डिया- डॉ. के.
एस. लाल, १९९२ पृष्ठ- १३२).
बहुत प्रारम्भिक अवस्था से ही शाहजहाँ ने काफिरों (हिन्दुओं) के प्रति युद्ध के लिए साहस व रुचि दिखाई थी।
अलग-अलग इतिहासकारों ने लिखा था कि, ''शहजादे के
रूप में ही शाहजहाँ ने फतेहपुर सीकरी पर अधिकार कर
लिया था और आगरा शहर में हिन्दुओं का भीषण नरसंहार किया था ।
भारत यात्रा पर आये देला वैले, इटली के एक धनी व्यक्ति के अुनसार -
शाहजहाँ की सेना ने भयानक बर्बरता का परिचय कराया था। हिन्दू नागरिकों को घोर यातनाओं द्वारा अपने संचित धन को दे देने के लिए विवश किया गया, और अनेकों उच्च कुल की कुलीन हिन्दू महिलाओं का शील भंग किया गया।''
(कीन्स हैण्ड बुक फौर विजिटर्स टू आगरा एण्ड इट्स
नेबरहुड, पृष्ठ २५)
हमारे वामपंथी इतिहासकारों ने शाहजहाँ को एक महान निर्माता के रूप में चित्रित किया है। किन्तु इस मुजाहिद ने अनेकों कला के प्रतीक सुन्दर हिन्दू मन्दिरों और अनेकों हिन्दू भवन निर्माण कला के केन्द्रों का बड़ी लगन और जोश से विध्वंस किया था।
अब्दुल हमीद ने अपने इतिहास अभिलेख, 'बादशाहनामा' में लिखा था-
'महामहिम शहंशाह महोदय की सूचना में लाया गया कि हिन्दुओं के एक प्रमुख केन्द्र, बनारस में उनके अब्बा हुजूर के शासनकाल में अनेकों मन्दिरों के पुनः निर्माण का काम प्रारम्भ हुआ था और काफिर हिन्दू अब उन्हें पूर्ण कर देने के निकट आ पहुँचे हैं।
इस्लाम पंथ के रक्षक, शहंशाह ने आदेश दिया कि बनारस में और उनके सारे राज्य में अन्यत्र सभी स्थानों पर जिन मन्दिरों का निर्माण कार्य आरम्भ है,उन सभी का विध्वंस कर दिया जाए।
इलाहाबाद प्रदेश से सूचना प्राप्त हो गई कि जिला बनारस के छिहत्तर मन्दिरों का ध्वंस कर दिया गया था।''
(बादशाहनामा : अब्दुल हमीद लाहौरी, अनुवाद एलियट और डाउसन, खण्ड VII, पृष्ठ ३६)
हिन्दू मंदिरों को अपवित्र करने और उन्हें ध्वस्त करने
की प्रथा ने शाहजहाँ के काल में एक व्यवस्थित विकराल रूप धारण कर लिया था।
(मध्यकालीन भारत - हरीश्चंद्र वर्मा - पेज-१४१)
''कश्मीर से लौटते समय १६३२ में
शाहजहाँ को बताया गया कि अनेकों मुस्लिम बनायी गयी महिलायें फिर से हिन्दू हो गईं हैं और उन्होंने हिन्दू परिवारों में शादी कर ली है।
शहंशाह के आदेश पर इन सभी हिन्दुओं को बन्दी बना लिया गया। प्रथम उन सभी पर इतना आर्थिक दण्ड थोपा गया कि उनमें से कोई भुगतान नहीं कर सका।
तब इस्लाम स्वीकार कर लेने और मृत्यु में से एक को चुन लेने का विकल्प दिया गया। जिन्होनें धर्मान्तरण स्वीकार नहीं किया, उन सभी पुरूषों का सर काट दिया गया। लगभग चार हजार पाँच सौं महिलाओं को बलात् मुसलमान बना लिया गया और उन्हें सिपहसालारों, अफसरों और शहंशाह के नजदीकी लोगों और रिश्तेदारों के हरम में भेज दिया गया।''
(हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ दी इण्डियन पीपुल : आर.
सी. मजूमदार, भारतीय विद्या भवन, पृष्ठ
३१२)
१६५७ में शाहजहाँ बीमार पड़ा और उसी के बेटे औरंगजेब ने उसे उसकी रखैल जहाँआरा के साथ
आगरा के किले में बंद कर दिया । परन्तु औरंगजेब मे एक आदर्श बेटे का भी फर्ज निभाया और अपने बाप की कामुकता को समझते हुए उसे अपने साथ ४० रखैलें (शाही वेश्याएँ) रखने की इजाजत दे दी। और दिल्ली आकर उसने बाप के हजारों रखैलों में से कुछ गिनी चुनी औरतों को अपने हरम में डालकर बाकी सभी को उसने किले से बाहर निकाल दिया।
उन हजारों महिलाओं को भी दिल्ली के उसी हिस्से में पनाह मिली जिसे आज दिल्ली का रेड लाईट एरिया जीबी रोड कहा जाता है। जो उसके अब्बा शाहजहाँ की मेहरबानी से ही बसा और गुलजार हुआ था ।
शाहजहाँ की मृत्यु आगरे के किले में ही २२ जनवरी १६६६ ईस्वी में ७४ साल की उम्र में द हिस्ट्री चैनल के अनुसार अत्यधिक कमोत्तेजक दवाएँ खा लेने का कारण हुई थी। यानी जिन्दगी के आखिरी वक्त तक वो अय्याशी ही करता रहा था।
अब आप खुद ही सोचें कि क्यों ऐसे बदचलन और दुश्चरित्र इंसान को प्यार की निशानी समझा कर महान
बताया जाता है...... ?????
क्या ऐसा बदचलन इंसान कभी किसी से प्यार
कर सकता है....?????
क्या ऐसे वहशी और क्रूर व्यक्ति की अय्याशी की कसमें
खाकर लोग अपने प्यार को बे-इज्जत नही करते हैं ??
दरअसल ताजमहल और प्यार की कहानी इसीलिए गढ़ी गयी है कि लोगों को गुमराह किया जा सके और लोगों खास कर हिन्दुओं से छुपायी जा सके कि ताजमहल कोई प्यार की निशानी नहीं बल्कि महाराज जय सिंह द्वारा बनवाया गया भगवान् शिव का मंदिर
""तेजो महालय"" है....!
और जिसे प्रमाणित करने के लिए डा० सुब्रहमण्यम स्वामी आज भी सुप्रीम कोर्ट में सत्य की लड़ाई लड़ रहे हैं।
असलियत में मुगल इस देश में धर्मान्तरण, लूट-खसोट और अय्याशी ही करते रहे परन्तु नेहरू के आदेश पर हमारे इतिहासकारों नें इन्हें जबरदस्ती महान बनाया। और ये सब हुआ झूठी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर।

भारत में इस्लामी आक्रमण एवं धर्मान्तरण का खूनी इतिहास (भाग-४) ।

भारत में इस्लामी आक्रमण एवं धर्मान्तरण का खूनी इतिहास (भाग-४) । ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ।
१२-शेर शाह सूरी (१५४०-१५४५)
शेरशाह सूरी एक अफगान था जिसने देहली में केवल पाँच वर्ष राज्य किया।
वामपंथी इतिहासकार कहते हैं कि उसने पेशावर से लेकर पूर्वी बंगाल तक छतीस सौ मील लम्बी ग्रांड ट्रंक रोड बनाई जबकि पाँच साल के इतने छोटे समय के दौरान वह अनेकों युद्धों में फंसा रहा और पूरी सड़क के आधे क्षेत्र में भी उसका शासन नहीं था तो आखिर उसने इतनी लम्बी सड़क बनाई कैसे..??
और सड़क के निर्माण का उस समय के किसी भी ऐतिहासिक अभिलेख में कोई भी वर्णन उपलब्ध नहीं है। यही नहीं सेकुलरिस्ट उसे धर्मनिरपेक्ष, परोपकारी और दयालु कहकर उसकी प्रशंसा भी करते हैं।
अब्बास खान रिजिवी ने अपने इतिहास अभिलेख
तारीख-ई-शेरशाही में लिखा-
"१५४३ में शेरहशाह ने रायसीन के हिन्दू दुर्ग पर
आक्रमण किया। छः महीने के घोर संघर्ष के उपरान्त
रायसीन का राजा पूरनमल हार गया। शेर शाह द्वारा दिये गये सुरक्षा और सम्मान के वचन का हिन्दुओं ने विश्वास कर लिया, और समर्पण कर दिया। किन्तु अगले दिन प्रातः काल हिन्दू, जैसे ही किले से बाहर आये, शेरशाह के आदेश पर अफगानों ने चारों ओर से आक्रमण कर दिया, और हिन्दुओं का वध प्रारम्भ कर दिया और एक आँख के इशारे मात्र समय में ही, सबके सब वध हो गये। महाराज पूरनमल की पत्नियाँ और परिवार बन्दी बना लिये गये। पूरन मल की एक पुत्री और उसके बड़े भाई के तीन पुत्रों को जीवित ले जाया गया और शेष को मार दिया गया।
शेरशाह ने राजा पूरनमल की पुत्री को किसी घुम्मकड़ बाजीगर को दे दिया जो उसे बाजार में नचा सके, और लड़कों को बधिया(खस्सी) प्रक्रिया द्वारा नपुंसक बनाकर अफसरों के हरम में औरतों की देखभाल करने के लिए भेज दिया।''
(तारीख-ई-शेरशाही : अब्बास खान शेरवानी, अनुवाद एलिएट और डाउसन, खण्ड IV, पृष्ठ ४०३)
अब्बास खान ने आगे लिखा-
'' उसने अपने घुड़सवारों को आदेश दिया कि हिन्दू गाँवों की जाँच पड़ताल करें, उन्हें मार्ग में जो पुरुष मिलें, उन्हें वध कर दें, औरतों और बच्चों को बन्दी बना लें, पशुओं को पकड़ लें, किसी को भी खेती न करने दें, पहले से बोई
फसलों को नष्ट कर दें, और किसी को भी पड़ोस के भागों से कुछ भी न लाने दें।''
(उसी पुस्तक में पृष्ठ ३१६)
१३-अहमद शाह अब्दाली (१७५७ और १७६१)
मथुरा और वृन्दावन में जिहाद (१७५७)
''किसान जाटों ने निश्चय कर लिया था कि ब्रज भूमि की पवित्र राजधानी में मुसलमान आक्रमणकारी उनकी लाशों पर होकर ही जा सकेंगे...
मथुरा के आठ मील उत्तर में २८ फरवरी १७५७ को जवाहर सिंह ने दस हजार से भी कम आदमियों के साथ आक्रमणकारियों का जीवन मरण की बाजी लगाकर, प्रतिरोध किया।
"सूर्योदय के बाद युद्ध नौ घण्टे तक चला। हिन्दू प्रतिरोधक अब आक्रमणकारियों के सामने बुरी तरह धराशायी हो गये। प्रथम मार्च के दिन निकलने के बहुत प्रारम्भिक काल में अफगान अश्वारोही फौज नें मथुरा शहर में किसी प्रकार की भी दया नहीं दिखाने की मनस्थिति में पूरे चार घण्टे तक, हिन्दू जनसंख्या का बिना किसी पक्षपात के, भरपूर मात्रा में, दिलखोलकर, नरसंहार व विध्वंस किया।
अंतत: प्राणरक्षार्थ काफिर हिन्दू अल्लाह के पंथ इस्लाम के प्रकाश में आये उनमें लगभग सभी के सभी निहत्थे असुरक्षित व असैनिक ही थे। उनमें से कुछ पुजारी थे... ''मूर्तियाँ तोड़ दी गईं और इस्लामी वीरों द्वारा, पोलों की गेदों की भाँति, ठुकराई गईं'',
(हुसैनशाही पृष्ठ ३९)''
''नरसंहार के पश्चात ज्योंही अहमद शाह की सेनायें मथुरा से आगे चलीं गई तो नजीब व उसकी सेना, वहाँ पीछे तीन दिन तक रूकी रही।
असंखय धन लूटा और बहुत सी सुन्दर हिन्दू महिलाओं
को बन्दी बनाकर ले गया।'' (नूर १५ b )
यमुना की नीली लहरों ने अपनी उन सभी पुत्रियों को शाश्वत शांति दी जितनी उसकी गोद में दौड़कर समा सकीं। कुछ अन्यों ने, अपने सम्मान सुरक्षा और अपमान से बचाव के लिए निकटस्थ, अपने घरों के कुओं में, कूदकर मृत्यु का आलिंगन कर लिया।
किन्तु उनकी उन बहिनों के लिए, जो जीवित तो रही परन्तु उनके सामने मृत्यु से भी कहीं अधिक बुरा जीवन था।
घटना के पन्द्रह दिन बाद एक मुस्लिम प्रत्यक्षदर्शी ने विध्वंस हुए शहर के दृश्य का वर्णन किया है।
''गलियों और बाजारों में सर्वत्र वध किये हुए काफिर व्यक्तियों के सिररहित, धड़, बिखरे पड़े थे। सारे शहर में आग लगी हुई थी। बहुत से भवनों को तोड़ दिया गया था।
जमुना में बहने वाला पानी, पीले जैसे रंग का था मानो कि रक्त से दूषित हो गया हो।''
''मथुरा के विनाश से मुक्ति पा, जहान खान आदेशों के अनुसार देश में लूटपाट करता हुआ घूमता फिरा।
मथुरा से सात मील उत्तर में, वृन्दावन भी नहीं बच सका...
पूर्णतः शांत स्वभाव वाले, आक्रामकताहीन, सन्त विष्णु भक्तों का वृन्दावन में भीषण नरसंहार किया गया।
(६ मार्च) उसी मुसलमान डाइरी लेखक ने वृन्दावन का भ्रमण कर लिखा था; ' 'जहाँ कहीं तुम देखोगे काफिरों के शवों के ढेर देखने को मिलेंगे। तुम अपना मार्ग बड़ी कठिनाई से ही निकाल सकते थे क्योंकि शवों की संख्या के आधिक्य और बिखराव तथा रक्त के बहाव के कारण मार्ग पूरी तरह रुक गया था। एक स्थान पर जहाँ हम पहुँचे तो देखा कि....
दुर्गन्ध और सड़ान्ध हवा में इतनी अधिक थी कि मुँह
खोलने और साँस लेना भी कष्ट कर था''
(फॉल ऑफ दी मुगल ऐम्पायर-सर जदुनाथ सरकार, नई दिल्ली १९९९ पृष्ठ ६९-७०)
अब्दाली का गोकुल पर आक्रमण
''अपन डेरे की एक टुकड़ी को गोकुल विजय के लिए भेजा गया। किन्तु यहाँ पर राजपूताना और उत्तर भारत के नागा सन्यासी सैनिक रूप में थे। राख लपेटे नग्न शरीर चार हजार सन्यासी सैनिक, बाहर खड़े थे और तब तक लड़ते रहे जब तक उनमें से सारे के सारे मर न गये, और उतने ही शत्रु पक्ष के सैनिकों की भी मृत्यु हुई।
सारे वैरागी तो मर गये, किन्तु शहर के देवता गोकुल नाथ बचे रहे, जैसा कि एक मराठा समाचार पत्र ने लिखा।''
(राजवाड़े प ६३, उसी पुस्तक में, पृष्ठ ७०-७१)
पानीपत में जिहाद (१७६१)
''युद्ध के प्रमुख स्थल पर कत्ल हुए शवों के इकत्तीस, पृथक-पृथक, ढेर गिने गये थे। प्रत्येक ढेर में शवों की संख्या, पाँच सौं से लेकर एक हजार तक,
और चार ढेरों में पन्द्रह सौ तक शव थे, कुल मिलाकर
अट्ठाईस हजार शव थे।
इनके अतिरिक्त मराठा डेरे के चारों ओर की रवाई शवों से पूरी तरह भरी हुई थी। लम्बी घेराबन्दी के कारण, इनमें से कुछ रोगों, और अकाल के शिकार थे,
तो कुछ घायल आदमी थे, जो युद्ध स्थल से बचकर,
रेंग रेंग कर, वहाँ मरने आ पहुँचे थे।
भूख और थकान के कारण, मरने वालों के शवों से, जंगल और सड़क भरे पड़े थे।
उनमें तीन चौथाई असैनिक और एक चौथाई सैनिक थे। जो घायल पड़े थे शीत की विकरालता के कारण मर गये।''
''संघर्षमय महाविनाश के पश्चात पूर्ण निर्दयतापूर्वक, नर संहार प्रारम्भ हुआ।
मूर्खता अथवा हताशा वश कई लाख मराठे जो विरोधी वातावरण वाले शहर पानीपत में छिप गये थे,
उन्हें अगले दिन खोज लिया गया, और एक मैदान में ले जाकर तलवार से वध कर दिया गया।
एक विवरण के अनुसार अब्दुल समद खान के पुत्रों और मियाँ कुत्ब को अपने पिता की मृत्यु का बदला ले लेने के लिए पूरे एक दिन भर मराठों के लाइन लगाकर वध करने की शाही, अनुमति मिल गई थी'',
और इसमें लगभग नौ हजार लोगों का वध किया गया था खभाऊ बखर १२३,;
वे सभी प्रत्यक्षतः, असैनिक व निहत्थे ही थे।
प्रत्यक्षदर्शी काशीराज पण्डित ने इस दृश्य का वर्णन इस प्रकार किया है-
''प्रत्येक सैनिक ने, अपने-अपने डेरों से, सौ या दो सौ, बन्दी बाहर निकाले, और यह चीखते हुए, कि, वह अपने देश से जब चला था तब उसकी माँ, बाप, बहिन और पत्नी ने उससे कहा था कि पवित्र जिहाद में विजय पा लेने के बाद वह उन प्रत्येक के नाम से इतने काफिरों का वध करे कि उन अविश्वासियों के वध के कारण, उन्हें धार्मिक श्रेष्ठता की मान्यता मिल जाए',
और उन्हें डेरों के बाहरी क्षेत्रों में ले जाकर तलवारों से वध कर दिया। ( ' सुरा ८ आयत ५९-६०)
''इस प्रकार हजारों सैनिक और अन्य नागरिक पूर्ण निर्ममता पूर्वक कत्ल कर दिये गये। शाह के डेरे में उसके सरदारों के आवासों को छोड़कर, प्रत्येक डेरे के सामने कटे हुए शिरों के ढेर पड़े हुए थे।''
(उसी पुस्तक में, पृष्ठ २१०-११)
१४-औरंगजेब (१६५८ - १७०७)
औरंगजेब द्वारा हिन्दुओं पर अमानवीय अत्याचारों की गाथा इतनी लम्बी है कि उसे संक्षिप्त लेख में बिल्कुल नहीं लिखा जा सकता है। उसकी केवल दो नीतियाँ थी काफिरों,सिखों को पकड़कर उन्हें इस्लाम या मृत्यु में से एक स्वीकार करवाना और दूसरा मन्दिरों का विध्वंस करके उनके स्थान पर मस्जिदें खड़ी करवाना।
गुरु तेग बहादुर का वध
गुरुजी ने हिन्दू ब्राह्मणों के गुहार पर कश्मीर में धर्म परिवर्तन के प्रतिरोध का नेतृत्व किया, इससे औरंगजेब क्रुद्ध हो गया और उसने गुरु जी को बन्दी बना लिया। औरंगजेब ने गुरु जी के सामने मृत्यु और इस्लाम में से एक को चुन लेने का विकल्प प्रस्तुत किया। गुरु जी ने धर्म त्याग देने को मना कर दिया और शहंशाह के आदेशानुसार,पाँच दिन तक अमानवीय यंत्रणायें देने के उपरान्त, गुरु जी का सिर काट दिया गया।
(विचित्र नाटक-गुरु गोविन्द सिंहः ग्रन्थ सूरज
प्रकाश-भाई सन्तोख सिंह : इवौल्यूशन ऑफ खालसा,
प्रोफैसर आई बनर्जी, १९६२)
औरंगजेब द्वारा भारतीय हिन्दू समाज के एक बड़े हिस्से को अत्याचारिक तरीकों द्वारा नरसंहार एवं धर्मान्तरित कर देने एवं प्राचीन भव्य मन्दिरों का विध्वंस कर देने की लम्बी कहानी अत्यंत संक्षिप्त रूप में पढ़ें:
औरंगजेब द्वारा मन्दिरों का विनाश
''सीतादास जौहरी द्वारा सरशपुर के निकट बनवाये
गये चिन्तामन मन्दिर का विध्वंस कर, उसके स्थान पर
शहजादे औरंगजेब के आदेशानुसार १६४५ में क्वातुल-
इस्लाम नामक मस्जिद बनावा दी ग्ई।'' (मीरात-ई-
अहमदी, २३२)। दी बौम्बे गजेटियर खण्ड I भाग I
पृष्ठ २८० ''मन्दिर में एक गाय
का वध भी किया गया।''
''मेरे ओदशानुसार, मेरे प्रवेश से पूर्व के दिनों में, अहमदाबार और गुजरात के अन्य परगनों में अनेकों मन्दिरों का विध्वंस कर दिया गया था।
(मीरात पृष्ठ. २७५)
''औरंगाबाद के निकट सतारा गाँव में पहाड़ी के शिखर पर खाण्डेराय का मूर्ति युक्त एक मन्दिर था। अल्लाह की कृपा से मैंने उसे ध्वंस कर दिया।''
(कालीमात-ई-अहमदी, पृष्ठ ३७२)
१९ दिसम्बर १६६१ को मीर जुम्ला ने, कूचविहार शहर में प्रवेश किया और आदेश दिया कि सभी हिन्दू मन्दिरों को ध्वंस कर दिया जाए और उनके स्थन पर मस्जिदें बनवा दी जाएँ।
"जनरल ने स्वयं, युद्ध की कुल्हाड़ी नेकर, नारायण की मूर्ति का ध्वंस कर दिया।''
(स्टुअर्ट्स बंगाल)
''जैसे ही शहंशाह ने सुना कि दाराशिकोह ने मथुरा के
केशवराय मन्दिर में पत्थरों की एक बाड़ को पुनः स्थापित करा दिया है, उसने कटाक्ष किया,
कि इस्लामी पंथ में तो मन्दिर की ओर देखना भी पाप
है और इसने मन्दिर की बाड़ को पुनः स्थापित
करा दिया है। मुहम्मदियों के लिए वह आचरण जनक
नहीं है। बाड़ को हटा दो। उसके आदेशानुसार मथुरा के
फौजदार अब्दुलनबी खान ने बाड़ को हटा दिया एवं इस युद्ध में बड़ी संख्या में काफिरों का नरसंहार हुआ।''
(अखबारातः ९वाँ वर्ष, स्बीत ७, १४ अक्टूबर १६६६)
२० नवम्बर १६६५ ''गुजरात प्रान्त के निकट के क्षेत्रों के लोगों ने ध्वंस किये गये मन्दिरों को पुनः बना लिया है... अतः शहंशाह आदेश देते हैं कि... पुनः स्थापित मन्दिरों को ध्वंस कर दिया जाए''
(फरमान जो मीरात २७३ में दिया गया)
९ अप्रैल १६६९ ''सभी प्रान्तों के
गवर्नरों को शहंशाह ने आदेश दिया कि काफिरों के सभी स्कूलों और मन्दिरों का विध्वंस कर दिया जाए और उनकी शिक्षा और धार्मिक क्रियाओं को पूरी शक्ति के साथ समाप्त कर दिया जाए-
''मासिर-ई-आलमगीरी"
मई १६६९ ''सलील बहादुर को मालारान के मन्दिर को तोड़ने के लिए भेजा गया।''
(मासीर-ई-आलम गीरी ८४)
२ सितम्बर १६६९ ''शाही आदेशानुसार शहंशाह के अफसरों ने बनारस के विश्वनाथ मन्दिर का ध्वंस कर
दिया (उसी पुस्तक में, ८८)
जनवरी १६७० ''रमजान के इस महीने में शहंशाह ने मथुरा के केशव मन्दिर के ध्वंस का आदेश किया। उसके अफसरों ने आज्ञा पालन किया बहुत बड़े खर्च के साथ उस मन्दिर के स्थान पर एक मस्जिद बना दी गई।
महान पन्थ इस्लाम के अल्लाह की खयाति बढ़े कि मन्दिर में स्थापित छोटी बड़ी सारी मूर्तियाँ, जिनमें बहुमूल्य जवाहरात जड़े हुए थे, आगरा नगर में लाई गईं, और जहाँनारा मस्जिद की सीढ़ियों में लगा दी गईं ताकि, उन्हें निरन्तर पैरों तले रौंदा जा सकें।''
(उसी पुस्तक में पृष्ठ ९५-९६)
''सैनोन के सीता राम जी मन्दिर का उसने आंशिक
ध्वंस किया; उसके अफसरों में से एक ने पुजारी को काट
डाला, मूर्ति को तोड़ दिया, और गोंड़ा की देवीपाटन के मन्दिर में गाय काटकर मन्दिर को अपवित्र कर दिया।''
(क्रुक का एन. डब्ल्यू. पी. ११२)
''कटक से लेकर उड़ीसा की सीमा पर मेदिनीपुर तक के
सभी थानों के फौजदारों, प्रशासन अधिकारियों के लिए आदेश प्रसारित किये गये कि; विगत दस बारह सालों में, जो भी मूर्तिघर बना हो, भले वह ईंटों से बनाया गया हो, या मिट्टी से, प्रत्येक को अविलम्ब नष्ट कर दिया जाए। घृणित अविश्वासियों को इस्लाम पंथ के प्रकाश में लाया जाए अन्यथा उनका वध कर दिया जाए।"
[मराकात-ई-अबुल हसन, (१६७० में पूर्ण की गई)
पृष्ठ २०२]
''उसने ८ मार्च १६७९ को खण्डेला और शानुला के
मन्दिरों का ध्वंस कर दिया और आसपास, अड़ौस
पड़ौस, अन्य के मन्दिरों को भी ध्वंस कर दिया।''
(मासीर-ई-आलमगीरी १७३)
२५ मई १६७९, ''जोधपुर में मन्दिरों का ध्वंस करके
और खण्डित मूर्तियों की कई गाड़ियाँ भर कर खान जहान बहादुर लौटा। शहंशाह ने आदेश दिया कि मूर्तियों, जिनमें अधिकांश सोने, चाँदी, पीतल, ताँबा या पत्थर की थीं, को दरबार के चौकोर मैदान में बिखेर दिया जाए और जामा मस्जिद की सीढ़ियों में लगा दिया जाए ताकि उनकों पैरों तले रौंदा जा सके।''
(मासीर-ई-आलमगीरी पृष्ठ १७५)
१७ जनवरी १९८० ''उदयपुर के महाराणा के महल के
सामने स्थित, एक विशाल मन्दिर, जो अपने युग के
महान भवनों में से एक था, और काफिरों ने जिसके निर्माण के ऊपर अपार धन व्यय किया था, उसे विध्वंस कर दिया गया, और उसकी मूर्तियाँ खण्डित कर दी गईं।''
(मासीर-ई- आलमगीरी १६८)
''२४ जनवरी को शहंशाह उदय सागर झील को देखने
गया और उसके किनारे स्थित तीनों मन्दिरों के ध्वंस का आदेश दे आया।''
(पृष्ठ १८८, उसी पुस्तक में)।
''२९ जनवरी को हसन अली खाँ ने सूचित
किया कि उदयपुर के चारों ओर के अन्य १७२ मन्दिर
ध्वंस कर दिये गये हैं''
(उसी पुस्तक में पृष्ठ १८९)
''१० अगस्त १६८० आबू टुराब दरबार में लौटा और
उसने सूचित किया कि उसने आमेर में ६६ मन्दिर तोड़
दिये हैं''
(पृष्ठ १९४)।
२ अगस्त १६८० को पश्चिमी मेवाड़ में सोमेश्वर मन्दिर को तोड़ देने का आदेश दिया गया।
(ऐडुब २८७a और २९०a)
सितम्बर १६८७ गोल कुण्डा की विजय के पश्चात् शहंशाह ने 'अब्दुल रहीम खाँ को हैदराबाद शहर का कोतवाल नियुक्त किया और आदेश दिया कि गैर मुसलमानों के रीति रिवाजों व
परम्पराओं तथा इस्लाम धर्म विरुद्ध नवीन
विचारों को समाप्त कर दें, काफिरों का वध कर दें अथवा इस्लाम में दीक्षित कर लें और मन्दिरों को ध्वंस कर
उनके स्थानों पर मस्जिदें बनवा दें।''
(खफ़ी खान ii ३५८-३५९)
''१६९३ में शहंशाह ने वाद नगर के मन्दिर हाटेश्वर, जो नागर ब्राह्मणों का संरक्षक था, को ध्वंस करने का आदेश किया''
- (मीरात ३४६)
१६९८ के मध्य में ''हमीदुद्दीन खाँन बहादुर, जिसे बीजापुर के मन्दिरों को ध्वंस करने और उस स्थान पर
मस्जिद बनाने के लिए नियुक्त किया था,
आदेशों का पालन कर दरबार में वापिस आया था।
शहंशाह ने उसकी प्रशंसा की थी।''
(मीरात ३९६)
''मन्दिर का ध्वंस किसी भी समय सम्भव है क्योंकि वह अपने स्थान से भाग कर नहीं जा सकता''
-(औरंगजेब से जुल्फि कार खान और मुगल खान
को पत्र (कलीमत-ई-तय्यीबात ३९ं)
''अभियानों के मध्य कुल्हाड़ियाँ ले जाने वाले
सरकारी आदमियों के पास पर्याप्त शक्ति व अवसर नहीं रहता अत: गैर-मुसलमानों के मन्दिरों को, तोड़ कर चूरा करने के लिए ,तुम्हें एक दरोगा नियुक्त कर देना चाहिए जो बाद में सुविधानुसार मन्दिरों को ध्वंस करा के उनकी नीवों को खुदवा दिया करे।''
(औरंगजेब से, रुहुल्ला खान को कांलीमत-ई-औरंगजेब
में पृष्ठ ३४ रामपुर M.S. और ३५a I.0.L.M.S.
३३०१)
१ जनवरी १७०५ ''कुल्हाड़ीधारी आदमियों के दरोगा,
मुहम्मद खलील को शहंशाह ने बुलाया... ओदश
दिया कि पण्ढरपुर के मन्दिरों को ध्वंस कर दिया जाए
और डेरे के कसाइयों को ले जाकर, मन्दिरों में
गायों का वध कराया जाए... आज्ञा पालन हुई''
(अखबारात ४९-७)
इस्लामी शैतानों की सूची इतनी लम्बी है एवं भारत समेत पूरी दुनियाँ में उनके द्वारा किये गये भीषण रक्तपात एवं अमानवीय अत्याचारों द्वारा करवाये गये धर्मपरिवर्तन की कहानी भी इतनी लम्बी है कि इन्हें संक्षिप्त से भी संक्षिप्त करके लिखना उन सभी असहाय भारतीय नागरिकों के साथ अन्याय है जो इनके हाथों बेरहमी से मारे गये।
सच तो ये है कि मुगल और अन्य सभी मुस्लिम आक्रमणकारी भारत में अय्याशी, लूट-खसोट, मार-काट एवं अन्य तरीकों से इसे दारूल हरब से दारूल इस्लाम बनाने में ही लगे रहे।
इन्होंने देश को कुछ इमारतों, कब्रों, मजारों एवं एक बड़ी धर्मान्तरित आबादी के अलावा कुछ नहीं दिया।
इनके हजार साल के शासन काल में एक भी वैज्ञानिक आविष्कार नहीं हुआ। बल्कि इस देश की आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक दशा में विनाशकारी एवं विभाजनकारी बदलाव आ गये।
कभी-कभी तो लगता है इनसे बेहतर तो ब्रिटिश थे जिन्होंने लूट-खसोट तो किया पर भारत को कानूनी एवं संवैधानिक लोकतंत्र, रेल, पुल, डाक, टेलीफोन, बिजली, चिकित्सा क्रान्ति, तरह-तरह के आवागमन के साधन एवं ज्ञान विज्ञान की नयी-नयी तकनीकें भी देकर गये जिनका लाभ हमें आज तक मिल रहा है।

टीपू सुल्तान

टीपू सुल्तान ने १४ दिसम्बर १७८८ को कालीकट के अपने सेना नायक को पत्र लिखा-
''मैं तुम्हारे पास मीर हुसैन अली के साथ अपने दो अनुयायी भेज रहा हूँ। उनके साथ तुम सभी हिन्दुओं को बन्दी बना लेना और यदि वो इस्लाम कबूल ना करे तो उनका वध कर देना।'' मेरा आदेश है कि बीस वर्ष से कम उम्र वालों को काराग्रह में रख लेना और शेष में से पाँच हजार का पेड़ पर लटकाकार वध कर देना।''
(भाषा पोशनी-मलयालम जर्नल, अगस्त १९२३)
(२) बदरुज़ समाँ खान को पत्र लिखा (दिनांक १९ जनवरी १७९०)
''क्या तुम्हें मालूम नहीं है कि मैंने मलाबार में एक बड़ी विजय प्राप्त की है चार लाख से अधिक हिन्दुओं को मुसलमान बना लिया गया । मैंनें अब उस रमन नायर की ओर बढ़ने का निश्चय किया हैं ताकि उसकी प्रजा को इस्लाम में धर्मान्तरित किया जाए। मैंने रंगापटनम वापस जाने का विचार त्याग दिया है।''
(उसी पुस्तक में)
‌३)अब्दुल कादर को पत्र लिखा (दिनांक २२ मार्च१७८८)
"बारह हजार से अधिक, हिन्दुओं को इस्लाम में धर्मान्तरित किया गया। इनमें अनेकों नम्बूदिरी थे। इस उपलब्धि का हिन्दुओं के बीच व्यापक प्रचार किया जाए। ताकि स्थानीय हिन्दुओं में भय व्याप्त हो और उन्हें इस्लाम में धर्मान्तरित किया जाए। किसी भी नम्बूदिरी को छोड़ा न जाए।''
(उसी पुस्तक में)
टीपू ने हिन्दुओं पर अत्यार एवं उनके धर्मान्तरण के लिए कुर्ग एवं मलाबार के विभिन्न क्षेत्रों में अपने सेना नायकों को अनेकों पत्र लिखे थे। जिन्हें प्रख्यात विद्वान और इतिहासकार सरदार पाणिक्कर ने लन्दन के इन्डिया आॅफिस लाइब्रेरी तक पहुँच कर ढूँढ निकाला था।
इन सूचनाओं, सन्देशों एवं पत्रों को आप भी RTI के माध्यम से प्राप्त कर पढ़ सकते हैं..।
टीपू का अपने सेनानायक को एक और पत्र-
''जिले के प्रत्येक हिन्दू का इस्लाम में धर्मान्तरण किया जाना चाहिए; अन्यथा उनका वध करना सर्वोत्तम है; उन्हें उनके छिपने के स्थान में खोजा जाना चाहिए; उनका इस्लाम में सम्पूर्ण धर्मान्तरण के लिए सभी मार्ग व युक्तियाँ सत्य-असत्य, कपट और बल सभी का प्रयोग किया जाना चाहिए।''
(हिस्टौरीकल स्कैचैज ऑफ दी साउथ ऑफ इण्डिया इन
एन अटेम्पट टू ट्रेस दी हिस्ट्री ऑफ मैसूर- मार्क विल्क्स, खण्ड २ पृष्ठ १२०)
मैसूर के तृतीय युद्ध (१७९२) के पहले से ही टीपू अफगानिस्तान के कट्टर इस्लामी शासक जमनशाह जो भारत में हिन्दुओं के खून की होली खेलने वाले अहमदशाह अब्दाली का परपोता था को पत्र लिखा करता था जिसे कबीर कौसर ने अपनी पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ टीपू सुल्तान' (पृ'१४१-१४७) में इसका अनुवाद किया है।
उस पत्र व्यवहार के कुछ अंश पढ़िये-
टीपू के ज़मन शाह के लिए पत्र
(i) ''महामहिम आपको सूचित किया गया होगा कि,
मेरी महान अभिलाषा का उद्देश्य जिहाद (धर्म युद्ध)
है। मेरी इस युक्ति का अल्लाह 'नोआ के आर्क' की भाँति रक्षा करता है और त्यागे हुए काफिरों की बढ़ी हुई भुजाओं को काटता रहता है।''
(ii) ''टीपू से जमनशाह को, पत्र दिनांक शहबान
का सातवाँ १२११ हिजरी (तदनुसार ५ फरवरी १७९७):
''... .इन परिस्थितियों में जो, पूर्व से लेकर पश्चिम तक,मैं विचार करता हूँ कि अल्लाह और उसके पैगम्बर के आदेशों से हमें अपने धर्म के शत्रुओं के विरुद्ध जिहाद करने के लिए, संगठित हो जाना चाहिए। इस क्षेत्र में इल्लाम के अनुयाई, शुक्रवार के दिन एक निश्चित किये हुए स्थान पर एकत्र होकर प्रार्थना करते हैं।
''हे अल्लाह! उन लोगों को, जिन्होंने इस्लाम का मार्ग रोक रखा है, कत्ल कर दो। उनके पापों को लिए, उनके निश्चित दण्ड द्वारा, उनके सिरों को दण्ड दो।''
मेरा पूरा विश्वास है कि सर्वशक्तिमान अल्लाह अपने प्रियजनों के हित के लिए उनकी प्रार्थनाएं स्वीकार कर लेगा और''तेरी (अल्लाह की) सेनायें ही विजयी होंगी'', 
टीपू ने अपनी बहुचर्चित तलवार' पर फारसी भाषा में लिखवाया-
''मेरे मालिक मेरी मदद कर कि मैं संसार से सभी काफिरों(गैर-मुसलमानों) को समाप्त कर दूँ"!
(हिस्ट्री ऑफ मैसूर सी.एच. राव खण्ड ३, पृष्ठ
१०७३)
श्री रंगपटनम के किले में प्राप्त टीपू का खुद लिखवाया एक शिला लेख पढ़िये-
शिलालेख के शब्द इस प्रकार हैं- ''हे सर्वशक्तिमान
अल्लाह! काफिरों(गैर-मुसलमानों) के समस्त समुदाय को समाप्त कर दे। उनकी सारी जाति को बिखरा दो, उनके पैरों को लड़खड़ा दो अस्थिर कर दो! और उनकी बुद्धियों को फेर दो! मृत्यु को उनके निकट ला दो, उनके पोषण के
साधनों को समाप्त कर दो। उनकी जिन्दगी के दिनों को कम कर दो। उनके शरीर सदैव उनकी चिंता के विषय बने रहें, उनके नेत्रों की दृष्टि छीन लो, उनके चेहरे काले कर दो, उनकी जीभ को बोलने के अंग को, नष्ट कर दो! उन्हें शिदौद की भाँति कत्ल कर दो जैसे फ़रोहा को डुबोया था, उन्हें भी डुबो दो, और उन पर अपार क्रोध करो। हे संसार के मालिक मुझे अपनी मदद दो।''
(उसी पुस्तक में पृष्ठ १०७४)
टीपू का जीवन चरित्र
टीपू की फारसी में लिखी, 'सुल्तान-उत-तवारीख'
और 'तारीख-ई-खुदादादी' नाम वाली दो जीवनियाँ हैं।
ये दोनों ही जीवनियाँ लन्दन की इण्डिया ऑफिस लाइब्रेरी में एम.एस. एस. क्रमानुसार ५२१ और २९९ रखी हुई हैं। इन
दोनों जीवनियों में टीपू ने स्वयं को इस्लाम का सच्चा नायक दिखाने के लिए हिन्दुओं पर ढाये अमानवीय अत्याचारों और यातनाओं, का विस्तृत वर्णन खुद ही किया है।
यहाँ तक कि मोहिब्बुल हसन, जिसने अपनी पुस्तक, हिस्ट्री ऑफ टीपू सुल्तान में टीपू को एक समझदार, उदार, और धर्मनिरपेक्ष शासक बताया था उसको भी स्वीकार करना पड़ा था कि
''तारीख यानी कि टीपू की जीवनियों के पढ़ने के बाद टीपू का जो चित्र उभरता है वह एक ऐसे धर्मान्ध, काफिरों से नफरत के लिए मतवाले पागल का है जो गैर-मुस्लिम लोगों की हत्या और उनके इस्लाम में बलात परिवर्तन कराने में सदैव लिप्त रहा आया।''
(हिस्ट्री ऑफ टीपू सुल्तान, मोहिब्बुल हसन, पृष्ठ ३५७)
टीपू ने १७८६ में गद्दी पर बैठते ही मैसूर को मुस्लिम राज्य घोषित कर दिया था और एक आम दरबार में घोषणा की ---
"मैं सभी काफिरों को मुसलमान बनाकर रहूंगा। "तुंरत ही उसने सभी हिन्दुओं को फरमान भी जारी कर दिया और मैसूर के गाँव- गाँव के मुस्लिम अधिकारियों के पास लिखित सूचना भिजवादी कि,
"सभी हिन्दुओं को इस्लाम में दीक्षा दो। जो स्वेच्छा से मुसलमान न बने उसे बलपूर्वक मुसलमान बनाओ और जो पुरूष विरोध करे, उनका कत्ल करवा दो। उनकी स्त्रियों को पकड़कर उन्हें दासी बनाकर मुसलमानों में बाँट दो।"
यह तांडव टीपू ने इतनी तेजी से चलाया कि, पूरे हिंदू समाज में त्राहि त्राहि मच गई. इस्लामिक दानवों से बचने का कोई उपाय न देखकर धर्म रक्षा के विचार से
हजारों हिंदू स्त्री पुरुषों ने अपने बच्चों सहित तुंगभद्रा आदि नदियों में कूद कर जान दे दी। हजारों ने अग्नि में प्रवेश कर अपनी जान दे दी।
इतिहासकार पाणिक्कर के अनुमान से टीपू ने अपने राज्य में लगभग ५ लाख हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाया था जबकि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है।
प्रत्यक्षदर्शियों के वर्णन-
दक्षिण भारत में इस्लाम के प्रसार के लिए टीपू द्वारा किये गये भीषण अत्याचारों और यातनाओं को एक पुर्तगाली यात्री और इतिहासकार, फ्रा बारटोलोमाको ने १७९० में अपनी आँखों से देखा था।
उसने जो कुछ मलाबार में देखा उसे अपनी पुस्तक, 'वौयेज टू ईस्ट इण्डीज' में लिख दिया था-
''कालीकट में हिन्दू आदमियों और औरतों को छोटी गलतियों के लिए फाँसी पर लटका दिया जाता था। ताकि वो जल्दी से जल्दी इस्लाम स्वीकार कर लें।
पहले माताओं को उनके बच्चों को उनकी गर्दनों से बाँधकर लटकाकर फाँसी दी जाती थी। उस बर्बर टीपू द्वारा नंगे हिन्दुओं और ईसाई लोगों को हाथियों की टांगों से बँधवा दिया जाता था और हाथियों को तब तक दौड़ाया जाता था जब तक कि उन असहाय निरीह विपत्तिग्रस्त प्राणियों के शरीरों के चिथड़े-चिथड़े नहीं हो जाते थे।
मन्दिरों और गिरिजों में आग लगाने, खण्डित करने, और ध्वंस करने के आदेश दिये जाते थे।
टीपू की सेना से बचकर भागने वालों और वाराप्पुझा पहुँच पाने वाले अभागे व्यक्तियों से सुनकर मैं विचलित हो उठा था... मैंने स्वंय अनेकों ऐसे विपत्ति ग्रस्त व्यक्तियों को वाराप्पुझा नदी को नाव द्वारा पार जाने के लिए सहयोग किया था।' '
(वौयेज टू ईस्ट इण्डीजः फ्रा बारटोलोमाको पृष्ठ १४१-१४२)
टीपू द्वारा मन्दिरों का विध्वंस
दी मैसूर गज़टियर बताता है कि ' 'टीपू ने दक्षिण भारत में आठ सौ से अधिक मन्दिर नष्ट किये थे।''
के.पी. पद्मानाभ मैनन द्वारा लिखित, 'हिस्ट्री ऑफ कोचीन और श्रीधरन मैनन द्वारा लिखित, हिस्ट्री ऑफ केरल' उन नष्ट किये गये मन्दिरों में से कुछ का वर्णन करते हैं-
''चिन्गम महीना ९५२ मलयालम कैलेंडर यानी अगस्त १७८६ में टीपू की फौज ने प्रसिद्ध पेरुमनम मन्दिर की मूर्तियों का ध्वंस किया और त्रिचूर ओर करवन्नूर नदी के मध्य के सभी मन्दिरों का ध्वंस कर दिया।
इरिनेजालाकुडा और थिरुवांचीकुलम के भव्य मन्दिरों को भी टीपू की सेना द्वारा नष्ट किया गया।
''अन्य प्रसिद्ध प्राचीन मन्दिरों में से कुछ, जिन्हें लूटा गया और नष्ट किया गया, था, वे थे-
त्रिप्रंगोट, थ्रिचैम्बरम्, थिरुमवाया, थिरवन्नूर, कालीकट थाली, हेमम्बिका मन्दिरपालघाट का जैन मन्दिर, माम्मियूर, परम्बाताली, पेम्मायान्दु, थिरवनजीकुलम, त्रिचूर का बडक्खुमन्नाथन मन्दिर, वेलूर शिवा मन्दिर आदि।''
टीपू ने अपनी डायरी में लिखा-
"चिराकुल राजा ने मेरी सेना द्वारा स्थानीय मन्दिरों को विनाश से बचाने के लिए मुझे चार लाख रुपये का सोना चाँदी देने का प्रस्ताव रखा था। किन्तु मैंने उत्तर दिया ''यदि सारी दुनिया भी मुझे दे दी जाए तो भी मैं हिन्दू मन्दिरों को ध्वंस करने से नहीं रुकूँगा''
(फ्रीडम स्ट्रगिल इन केरल : सरदार के.एम.पाणिक्कर)
टीपू द्वारा केरल की विजय का प्रलयंकारी एवं सजीव वर्णन, 'गजैटियर ऑफ केरल के सम्पादक और विखयात इतिहासकार ए. श्रीधर मैनन द्वारा किया गया है। उसके अनुसार-
"हिन्दू लोग, विशेष कर नायर और सरदार जाति के लोग जिन्होंने टीपू के पहले से ही इस्लामी आक्रमणकारियों का प्रतिरोध किया था, टीपू के क्रोध का प्रमुख निशाना बन गये थे।
सैकड़ों नायर महिलाओं और बच्चों को पकड़ कर श्री रंगपटनम ले जाया गया और डचों के हाथ दास के रूप में बेच दिया गया था। हजारों ब्राह्मणों, क्षत्रियों और हिन्दुओं के अन्य सम्माननीय जाति के लोगों को इस्लाम या मृत्यु में से एक चुनने को बाध्य किया गया।''
हमारे मार्क्सिस्ट इतिहासकारों ने धर्मनिरपेक्षता का झूठा ढोंग कर टीपू सुल्तान को वीर और देशभक्त पुरुष के रूप में वर्णन किया है। किन्तु सच्चाई तो ये है कि टीपू का सम्बन्ध उस राष्ट्र,उस मिट्टी से कभी भी नहीं रहा जो उसका गृह स्थान था। वह केवल हिन्दू भूमि का एक मुस्लिम शासक था। जैसा उसने स्वंय कहा था उसके जीवन का उद्देश्य अपने राज्य को दारुल इस्लाम (इस्लामी देश) बनाना था। टीपू ब्रिटिशों से अपने ताज की सुरक्षा के लिए लड़ा था न कि देश को विदेशी गुलामी से मुक्त कराने के लिए।
उसने तो स्वयं भारत पर आक्रमण करने, और राज्य करने के लिए अफगानिस्तान के जहनशाह को आमंत्रित
किया था।(जहनशाह को लिखे पत्रों को पढ़िये)
भारत के सैक्यूलरिस्टों ने राष्ट्रीय एकता और धर्मनिरपेक्षता की आड़ लेकर हमेशा से ही इतिहास, साहित्य और पुस्तकों से लेकर आजादी की लड़ाई और आजादी के बाद के भारत-पाकिस्तान युद्धों तक में मुस्लिमों को जबरदस्ती हीरो बनाने की कोशिश की है। प्रयास अच्छा है परन्तु इस प्रयास में हमलावरों, लुटेरों, खूनियों और हत्यारों को भी नायकों की तरह प्रस्तुत करना समझ से परे है।
लेकिन अब वोटबैंक के लालची राजनीतिज्ञों के आदेश पर लिखने वाले इन पैसों के भूखे लेखकों की समझ में आ जाना चाहिए कि इन मुस्लिम अत्याचारियों और हमलावरों के, हिन्दुओं पर किये गये अत्याचारों, को दबाने, छिपाने से, कोई भी लाभ नहीं हो सकेगा क्योंकि अब राष्ट्रवादियों के हाथों में सदी के संचार का सबसे बड़ा हथियार सोशल मीडिया आ चुका है। जो इन नकली धर्मनिरपेक्ष लेखकों के हर झूठ की परतें उघाड़ कर रख देगा।
सामान्य हिन्दुओं को भी समझ लेना चाहिए कि, अपने देश के इतिहास का पूर्ण ज्ञान, और अपने पूर्वजों के भाग्य-दुर्भाग्य, से पाठ सीख लेना अनिवार्य है; क्योंकि इतिहास की पुनरावृत्ति जरूर होती है।

अकबर

अकबर के समय के इतिहास लेखक अहमद यादगार ने लिखा-
"बैरम खाँ ने निहत्थे और बुरी तरह घायल हिन्दू राजा हेमू के हाथ पैर बाँध दिये और उसे नौजवान शहजादे के पास ले गया और बोला, आप अपने पवित्र हाथों से इस काफिर का कत्ल कर दें और"गाज़ी"की उपाधि कुबूल करें, और शहजादे ने उसका सिर उसके अपवित्र धड़ से अलग कर दिया।'' (नवम्बर, ५ AD १५५६)
(तारीख-ई-अफगान, अहमद यादगार,अनुवाद एलियट और डाउसन, खण्ड VI, पृष्ठ ६५-६६)
इस तरह अकबर ने १४ साल की आयु में ही गाज़ी(काफिरों का कातिल) होने का सम्मान पाया। 
इसके बाद हेमू के कटे सिर को काबुल भिजवा दिया और धड़ को दिल्ली के दरवाजे पर टांग दिया।
अबुल फजल ने आगे लिखा - ''हेमू के पिता को जीवित ले आया गया और नासिर-उल-मलिक के सामने पेश किया गया जिसने उसे इस्लाम कबूल करने का आदेश दिया, किन्तु उस वृद्ध पुरुष ने उत्तर दिया, ''मैंने अस्सी वर्ष तक अपने ईश्वर की पूजा की है; मै अपने धर्म को कैसे त्याग सकता हूँ?
मौलाना परी मोहम्मद ने उसके उत्तर को अनसुना कर अपनी तलवार से उसका सर काट दिया।''
(अकबर नामा, अबुल फजल : एलियट और डाउसन, पृष्ठ २१)
इस विजय के तुरन्त बाद अकबर ने काफिरों के कटे हुए सिरों से एक ऊँची मीनार बनवायी।
२ सितम्बर १५७३ को भी अकबर ने अहमदाबाद में २००० दुश्मनों के सिर काटकर अब तक की सबसे ऊँची सिरों की मीनार बनवायी और अपने दादा बाबर का रिकार्ड तोड़ दिया। (मेरे पिछले लेखों में पढ़िए) यानी घर का रिकार्ड घर में ही रहा।
अकबरनामा के अनुसार ३ मार्च १५७५ को अकबर ने बंगाल विजय के दौरान इतने सैनिकों और नागरिकों की हत्या करवायी कि उससे कटे सिरों की आठ मीनारें बनायी गयीं। यह फिर से एक नया रिकार्ड था।
जब वहाँ के हारे हुए शासक दाउद खान ने मरते समय पानी माँगा तो उसे जूतों में भरकर पानी पीने के लिए दिया गया।
अकबर की चित्तौड़ विजय के विषय में अबुल फजल ने
लिखा था- ''अकबर के आदेशानुसार प्रथम ८०००
राजपूत योद्धाओं को बंदी बना लिया गया, और बाद में उनका वध कर दिया गया। उनके साथ-साथ विजय के बाद प्रात:काल से दोपहर तक अन्य ४०००० किसानों का भी वध कर दिया गया जिनमें ३००० बच्चे और बूढ़े थे।''
(अकबरनामा, अबुल फजल, अनुवाद एच. बैबरिज)
चित्तौड़ की पराजय के बाद महारानी जयमाल मेतावाड़िया समेत १२००० क्षत्राणियों ने मुगलों के हरम में जाने की अपेक्षा जौहर की अग्नि में स्वयं को जलाकर भस्म कर लिया। जरा कल्पना कीजिए विशाल गड्ढों में धधकती आग और दिल दहला देने वाली चीखों-पुकार के बीच उसमें कूदती १२००० महिलाएँ ।
अपने हरम को सम्पन्न करने के लिए अकबर ने अनेकों हिन्दू राजकुमारियों के साथ जबरनठ शादियाँ की थी परन्तु कभी भी, किसी मुगल महिला को हिन्दू से शादी नहीं करने दी। केवल अकबर के शासनकाल में 38 राजपूत राजकुमारियाँ शाही खानदान में ब्याही जा चुकी थीं। १२ अकबर को, १७ शाहजादा सलीम को, छः दानियाल को, २ मुराद को और १ सलीम के पुत्र खुसरो को।
अकबर की गंदी नजर गौंडवाना की विधवा रानी दुर्गावती पर थी
''सन् १५६४ में अकबर ने अपनी हवस की शांति के लिए रानी दुर्गावती पर आक्रमण कर दिया किन्तु एक वीरतापूर्ण संघर्ष के बाद अपनी हार निश्चित देखकर रानी ने अपनी ही छाती में छुरा घोंपकर आत्म हत्या कर ली। किन्तु उसकी बहिन और पुत्रवधू को को बन्दी बना लिया गया। और अकबर ने उसे अपने हरम में ले लिया। उस समय अकबर की उम्र २२ वर्ष और रानी दुर्गावती की ४० वर्ष थी।''
(आर. सी. मजूमदार, दी मुगल ऐम्पायर, खण्ड VII)
सन् 1561 में आमेर के राजा भारमल और उनके ३ राजकुमारों को यातना दे कर उनकी पुत्री को साम्बर से अपहरण कर अपने हरम में आने को मज़बूर किया।
औरतों का झूठा सम्मान करने वाले अकबर ने सिर्फ अपनी हवस मिटाने के लिए न जाने कितनी मुस्लिम औरतों की भी अस्मत लूटी थी। इसमें मुस्लिम नारी चाँद बीबी का नाम भी है।
अकबर ने अपनी सगी बेटी आराम बेगम की पूरी जिंदगी शादी नहीं की और अंत में उस की मौत अविवाहित ही जहाँगीर के शासन काल में हुई।
सबसे मनगढ़ंत किस्सा कि अकबर ने दया करके सतीप्रथा पर रोक लगाई; जबकि इसके पीछे उसका मुख्य मकसद केवल यही था की राजवंशीय हिन्दू नारियों के पतियों को मरवाकर एवं उनको सती होने से रोककर अपने हरम में डालकर एेय्याशी करना।
राजकुमार जयमल की हत्या के पश्चात अपनी अस्मत बचाने को घोड़े पर सवार होकर सती होने जा रही उसकी पत्नी को अकबर ने रास्ते में ही पकड़ लिया।
शमशान घाट जा रहे उसके सारे सम्बन्धियों को वहीं से कारागार में सड़ने के लिए भेज दिया और राजकुमारी को अपने हरम में ठूंस दिया ।
इसी तरह पन्ना के राजकुमार को मारकर उसकी विधवा पत्नी का अपहरण कर अकबर ने अपने हरम में ले लिया।
अकबर औरतों के लिबास में मीना बाज़ार जाता था जो हर नये साल की पहली शाम को लगता था। अकबर अपने दरबारियों को अपनी स्त्रियों को वहाँ सज-धज कर भेजने का आदेश देता था। मीना बाज़ार में जो औरत अकबर को पसंद आ जाती, उसके महान फौजी उस औरत को उठा ले जाते और कामी अकबर की अय्याशी के लिए हरम में पटक देते। अकबर महान उन्हें एक रात से लेकर एक महीने तक अपनी हरम में खिदमत का मौका देते थे।
जब शाही दस्ते शहर से बाहर जाते थे तो अकबर के हरम
की औरतें जानवरों की तरह महल में बंद कर दी जाती थीं।
अकबर ने अपनी अय्याशी के लिए इस्लाम का भी दुरुपयोग किया था। चूँकि सुन्नी फिरके के अनुसार एक मुस्लिम एक साथ चार से अधिक औरतें नहीं रख सकता और जब अकबर उस से अधिक औरतें रखने लगा तो काजी ने उसे रोकने की कोशिश की। इस से नाराज होकर अकबर ने उस सुन्नी काजी को हटा कर शिया काजी को रख लिया क्योंकि शिया फिरके में असीमित और अस्थायी शादियों की इजाजत है , ऐसी शादियों को अरबी में "मुतअ" कहा जाता है।
अबुल फज़ल ने अकबर के हरम को इस तरह वर्णित किया है-
“अकबर के हरम में पांच हजार औरतें थीं और ये पांच हजार औरतें उसकी ३६ पत्नियों से अलग थीं। शहंशाह के महल के पास ही एक शराबखाना बनाया गया था। वहाँ इतनी वेश्याएं इकट्ठी हो गयीं कि उनकी गिनती करनी भी मुश्किल हो गयी। अगर कोई दरबारी किसी नयी लड़की को घर ले जाना चाहे तो उसको अकबर से आज्ञा लेनी पड़ती थी। कई बार सुन्दर लड़कियों को ले जाने के लिए लोगों में झगड़ा भी हो जाता था। एक बार अकबर ने खुद कुछ वेश्याओं को बुलाया और उनसे पूछा कि उनसे सबसे पहले भोग किसने किया”।
बैरम खान जो अकबर के पिता जैसा और संरक्षक था,
उसकी हत्या करके इसने उसकी पत्नी अर्थात अपनी माता के समान स्त्री से शादी की ।
इस्लामिक शरीयत के अनुसार किसी भी मुस्लिम राज्य में रहने वाले गैर मुस्लिमों को अपनी संपत्ति और स्त्रियों को छिनने से बचाने के लिए इसकी कीमत देनी पड़ती थी जिसे जजिया कहते थे। कुछ अकबर प्रेमी कहते हैं कि अकबर ने जजिया खत्म कर दिया था। लेकिन इस बात का इतिहास में एक जगह भी उल्लेख नहीं! केवल इतना है कि यह जजिया रणथम्भौर के लिए माफ करने की शर्त रखी गयी थी।
रणथम्भौर की सन्धि में बूंदी के सरदार को शाही हरम में औरतें भेजने की "रीति" से मुक्ति देने की बात लिखी गई थी। जिससे बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि अकबर ने युद्ध में हारे हुए हिन्दू सरदारों के परिवार की सर्वाधिक सुन्दर महिला को मांग लेने की एक परिपाटी बना रखी थीं और केवल बूंदी ही इस क्रूर रीति से बच पाया था।
यही कारण था की इन मुस्लिम सुल्तानों के काल में हिन्दू स्त्रियों के जौहर की आग में जलने की हजारों घटनाएँ हुईं ।
जवाहर लाल नेहरु ने अपनी पुस्तक ''डिस्कवरी ऑफ इण्डिया'' में अकबर को 'महान' कहकर उसकी प्रशंसा की है। हमारे कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने भी अकबर को एक परोपकारी उदार, दयालु और धर्मनिरपेक्ष शासक बताया है।
अकबर के दादा बाबर का वंश तैमूरलंग से था और मातृपक्ष का संबंध चंगेज खां से था। इस प्रकार अकबर की नसों में एशिया की दो प्रसिद्ध आतंकी और खूनी जातियों, तुर्क और मंगोल के रक्त का सम्मिश्रण था।
जिसके खानदान के सारे पूर्वज दुनिया के सबसे बड़े जल्लाद थे और अकबर के बाद भी जहाँगीर और औरंगजेब दुनिया के सबसे बड़े दरिन्दे थे तो ये बीच में
महानता की पैदाईश कैसे हो गयी।
अकबर के जीवन पर शोध करने वाले इतिहासकार विंसेट स्मिथ ने साफ़ लिखा है की अकबर एक दुष्कर्मी, घृणित एवं नृशंश हत्याकांड करने वाला क्रूर शाशक था।
विन्सेंट स्मिथ ने किताब ही यहाँ से शुरू की है कि “अकबर भारत में एक विदेशी था. उसकी नसों में एक बूँद खून भी भारतीय नहीं था । अकबर मुग़ल से ज्यादा एक तुर्क था”।
चित्तौड़ की विजय के बाद अकबर ने कुछ फतहनामें प्रसारित करवाये थे। जिससे हिन्दुओं के प्रति उसकी गहन आन्तरिक घृणा प्रकाशित हो गई थी।
उनमें से एक फतहनामा पढ़िये-
''अल्लाह की खयाति बढ़े इसके लिए हमारे कर्तव्य परायण मुजाहिदीनों ने अपवित्र काफिरों को अपनी बिजली की तरह चमकीली कड़कड़ाती तलवारों द्वारा वध कर दिया। ''हमने अपना बहुमूल्य समय और अपनी शक्ति घिज़ा (जिहाद) में ही लगा दिया है और अल्लाह के सहयोग से काफिरों के अधीन बस्तियों, किलों, शहरों को विजय कर अपने अधीन कर लिया है, कृपालु अल्लाह उन्हें त्याग दे
और उन सभी का विनाश कर दे। हमने पूजा स्थलों उसकी मूर्तियों को और काफिरों के अन्य स्थानों का विध्वंस कर दिया है।"
(फतहनामा-ई-चित्तौड़ मार्च १५८६,नई दिल्ली)
महाराणा प्रताप के विरुद्ध अकबर के अभियानों के लिए
सबसे बड़ा प्रेरक तत्व था इस्लामी जिहाद की भावना जो उसके अन्दर कूट-कूटकर भरी हुई थी।
अकबर के एक दरबारी इमाम अब्दुल कादिर बदाउनी ने अपने इतिहास अभिलेख, 'मुन्तखाव-उत-तवारीख' में लिखा था कि १५७६ में जब शाही फौजें राणाप्रताप के खिलाफ युद्ध के लिए अग्रसर हो रहीं थीं तो मैनें (बदाउनीने) ''युद्ध अभियान में शामिल होकर हिन्दुओं के रक्त से अपनी इस्लामी दाढ़ी को भिगोंकर शाहंशाह से भेंट की अनुमति के लिए प्रार्थना की।''मेरे व्यक्तित्व और जिहाद के प्रति मेरी निष्ठा भावना से अकबर इतना प्रसन्न हुआ कि उन्होनें प्रसन्न होकर मुझे मुठ्ठी भर सोने की मुहरें दे डालीं।"
(मुन्तखाब-उत-तवारीख : अब्दुल कादिर बदाउनी, खण्ड II, पृष्ठ ३८३,अनुवाद वी. स्मिथ, अकबर दी ग्रेट मुगल, पृष्ठ १०८)
बदाउनी ने हल्दी घाटी के युद्ध में एक मनोरंजक घटना के बारे में लिखा था-
''हल्दी घाटी में जब युद्ध चल रहा था और अकबर की सेना से जुड़े राजपूत, और राणा प्रताप की सेना के राजपूत जब परस्पर युद्धरत थे और उनमें कौन किस ओर है, भेद कर पाना असम्भव हो रहा था, तब मैनें शाही फौज के अपने सेना नायक से पूछा कि वह किस पर गोली चलाये ताकि शत्रु ही मरे।
तब कमाण्डर आसफ खाँ ने उत्तर दिया कि यह जरूरी नहीं कि गोली किसको लगती है क्योंकि दोनों ओर से युद्ध करने वाले काफिर हैं, गोली जिसे भी लगेगी काफिर ही मरेगा, जिससे लाभ इस्लाम को ही होगा।''
(मुन्तखान-उत-तवारीख : अब्दुल कादिर बदाउनी,
खण्ड II,अनु अकबर दी ग्रेट मुगल : वी. स्मिथ पुनः मुद्रित १९६२; हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ दी इण्डियन पीपुल, दी मुगल ऐम्पायर :आर. सी. मजूमदार, खण्ड VII, पृष्ठ १३२ तृतीय संस्करण)
जहाँगीर ने, अपनी जीवनी, ''तारीख-ई-सलीमशाही'' में लिखा था कि ' 'अकबर और जहाँगीर के शासन काल में पाँच से छः लाख की संख्या में हिन्दुओं का वध हुआ था।''
(तारीख-ई-सलीम शाही, अनु. प्राइस, पृष्ठ २२५-२६)
जून 1561- एटा जिले के (सकित परंगना) के 8 गावों की हिंदू जनता के विरुद्ध अकबर ने खुद एक आक्रमण का संचालन किया और परोख नाम के गाँव में मकानों में बंद करके १००० से ज़्यादा हिंदुओं को जिंदा जलवा दिया था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार उनके इस्लाम कबूल ना करने के कारण ही अकबर ने क्रुद्ध होकर ऐसा किया।
थानेश्वर में दो संप्रदायों कुरु और पुरी के बीच पूजा की जगह को लेकर विवाद चल रहा था. अकबर ने आदेश
दिया कि दोनों आपस में लड़ें और जीतने वाला जगह पर कब्ज़ा कर ले। उन मूर्ख लोगों ने आपस में ही अस्त्र शस्त्रों से लड़ाई शुरू कर दी। जब पुरी पक्ष जीतने लगा तो अकबर ने अपने सैनिकों को कुरु पक्ष की तरफ से लड़ने का आदेश दिया. और अंत में इसने दोनों ही तरफ के लोगों को अपने सैनिकों से मरवा डाला और फिर अकबर महान जोर से हंसा।
एक बार अकबर शाम के समय जल्दी सोकर उठ गया तो उसने देखा कि एक नौकर उसके बिस्तर के पास सो रहा है। इससे उसको इतना गुस्सा आया कि नौकर को मीनार से नीचे फिंकवा दिया।
अगस्त १६०० में अकबर की सेना ने असीरगढ़ का किला घेर लिया पर मामला बराबरी का था।विन्सेंट स्मिथ ने लिखा है कि अकबर ने एक अद्भुत तरीका सोचा। उसने किले के राजा मीरां बहादुर को संदेश भेजकर अपने सिर की कसम खाई कि उसे सुरक्षित वापस जाने देगा। जब मीरां शान्ति के नाम पर बाहर आया तो उसे अकबर के सामने सम्मान दिखाने के लिए तीन बार झुकने का आदेश दिया गया क्योंकि अकबर महान को यही पसंद था।
उसको अब पकड़ लिया गया और आज्ञा दी गयी कि अपने सेनापति को कहकर आत्मसमर्पण करवा दे। मीराँ के सेनापति ने इसे मानने से मना कर दिया और अपने लड़के को अकबर के पास यह पूछने भेजा कि उसने अपनी प्रतिज्ञा क्यों तोड़ी? अकबर ने उसके बच्चे से पूछा कि क्या तेरा पिता आत्मसमर्पण के लिए तैयार है? तब बालक ने कहा कि चाहे राजा को मार ही क्यों न डाला जाए उसका पिता समर्पण नहीं करेगा। यह सुनकर अकबर महान ने उस बालक को मार डालने का आदेश दिया। यह घटना अकबर की मृत्यु से पांच साल पहले की ही है।
हिन्दुस्तानी मुसलमानों को यह कह कर बेवकूफ बनाया जाता है कि अकबर ने इस्लाम की अच्छाइयों को पेश किया. असलियत यह है कि कुरआन के खिलाफ जाकर ३६ शादियाँ करना, शराब पीना, नशा करना, दूसरों से अपने आगे सजदा करवाना आदि इस्लाम के लिए हराम है और इसीलिए इसके नाम की मस्जिद भी हराम है।
अकबर स्वयं पैगम्बर बनना चाहता था इसलिए उसने अपना नया धर्म "दीन-ए-इलाही - ﺩﯾﻦ ﺍﻟﻬﯽ " चलाया। जिसका एकमात्र उद्देश्य खुद की बड़ाई करवाना था। यहाँ तक कि मुसलमानों के कलमें में यह शब्द "अकबर खलीफतुल्लाह - ﺍﻛﺒﺮ ﺧﻠﻴﻔﺔ ﺍﻟﻠﻪ " भी जुड़वा दिया था।
उसने लोगों को आदेश दिए कि आपस में अस्सलाम वालैकुम नहीं बल्कि “अल्लाह ओ अकबर” कहकर एक दूसरे का अभिवादन किया जाए।
यही नहीं अकबर ने हिन्दुओं को गुमराह करने के लिए एक फर्जी उपनिषद् "अल्लोपनिषद" बनवाया था जिसमें अरबी और संस्कृत मिश्रित भाषा में मुहम्मद को अल्लाह का रसूल और अकबर को खलीफा बताया गया था। इस फर्जी उपनिषद् का उल्लेख महर्षि दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश में किया है।
उसके चाटुकारों ने इस धूर्तता को भी उसकी उदारता की तरह पेश किया। जबकि वास्तविकता ये है कि उस धर्म को मानने वाले अकबरनामा में लिखित कुल १८ लोगों में से केवल एक हिन्दू बीरबल था।
अकबर ने अपने को रूहानी ताकतों से भरपूर साबित करने के लिए कितने ही झूठ बोले। जैसे कि उसके पैरों की धुलाई करने से निकले गंदे पानी में अद्भुत ताकत है जो रोगों का इलाज कर सकता है। अकबर के पैरों का पानी लेने के लिए लोगों की भीड़ लगवाई जाती थी। उसके दरबारियों को तो इसलिए अकबर के नापाक पैर का चरणामृत पीना पड़ता था ताकि वह नाराज न हो जाए।
अकबर ने एक आदमी को केवल इसी काम पर रखा था कि वह उनको जहर दे सके जो लोग उसे पसंद नहीं।
अकबर महान ने न केवल कम भरोसेमंद लोगों का कतल
कराया बल्कि उनका भी कराया जो उसके भरोसे के आदमी थे जैसे- बैरम खान (अकबर का गुरु जिसे मारकर अकबर ने उसकी बीवी से निकाह कर लिया), जमन, असफ खान (इसका वित्त मंत्री), शाह मंसूर, मानसिंह, कामरान का बेटा, शेख अब्दुरनबी, मुइजुल मुल्क, हाजी इब्राहिम और बाकी सब जो इसे नापसंद थे। पूरी सूची स्मिथ की किताब में दी हुई है।
अकबर के चाटुकारों ने राजा विक्रमादित्य के दरबार की कहानियों के आधार पर उसके दरबार और नौ रत्नों की कहानी गढ़ी। पर असलियत यह है कि अकबर अपने
सब दरबारियों को मूर्ख समझता था। उसने स्वयं कहा था कि वह अल्लाह का शुक्रगुजार है कि उसको योग्य दरबारी नहीं मिले वरना लोग सोचते कि अकबर का राज उसके दरबारी चलाते हैं वह खुद नहीं।
अकबरनामा के एक उल्लेख से स्पष्ट हो जाता है कि उसके हिन्दू दरबारियों का प्रायः अपमान हुआ करता था। ग्वालियर में जन्में संगीत सम्राट रामतनु पाण्डेय उर्फ तानसेन की तारीफ करते-करते मुस्लिम दरबारी उसके मुँह में चबाया हुआ पान ठूँस देते थे।
भगवन्त दास और दसवंत ने सम्भवत: इसी लिए आत्महत्या कर ली थी।
प्रसिद्ध नवरत्न टोडरमल अकबर की लूट का हिसाब करता था। इसका काम था जजिया न देने वालों की औरतों को हरम का रास्ता दिखाना। वफादार होने के बावजूद अकबर ने एक दिन क्रुद्ध होकर उसकी पूजा की मूर्तियाँ तुड़वा दी।
जिन्दगी भर अकबर की गुलामी करने के बाद टोडरमल ने अपने जीवन के आखिरी समय में अपनी गलती मान कर दरबार से इस्तीफा दे दिया और अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए प्राण त्यागने की इच्छा से वाराणसी होते हुए हरिद्वार चला गया और वहीं मरा।
लेखक और नवरत्न अबुल फजल को स्मिथ ने अकबर का अव्वल दर्जे का निर्लज्ज चाटुकार बताया। बाद में जहाँगीर ने इसे मार डाला।
फैजी नामक रत्न असल में एक साधारण सा कवि था जिसकी कलम अपने शहंशाह को प्रसन्न करने के लिए ही चलती थी।
बीरबल शर्मनाक तरीके से एक लड़ाई में मारा गया। बीरबल अकबर के किस्से असल में मन बहलाव की बातें हैं जिनका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं। ध्यान रहे
कि ऐसी कहानियाँ दक्षिण भारत में तेनालीराम के नाम से
भी प्रचलित हैं।
एक और रत्न शाह मंसूर दूसरे रत्न अबुल फजल के हाथों अकबर के आदेश पर मार डाला गया ।
मान सिंह जो देश में पैदा हुआ सबसे नीच गद्दार था, ने अपनी बेटी तो अकबर को दी ही जागीर के लालच में कई और राजपूत राजकुमारियों को तुर्क हरम में पहुँचाया। बाद में जहांगीर ने इसी मान सिंह की पोती को भी अपने हरम में खींच लिया।
मानसिंह ने पूरे राजपूताने के गौरव को कलंकित किया था। यहाँ तक कि उसे अपना आवास आगरा में बनाना पड़ा क्योंकि वो राजस्थान में मुँह दिखाने के लायक नहीं था। यही मानसिंह जब संत तुलसीदास से मिलने गया तो अकबर ने इस पर गद्दारी का संदेह कर दूध में जहर देकर मरवा डाला और इसके पिता भगवान दास ने लज्जित होकर आत्महत्या कर ली।
इन नवरत्नों को अपनी बीवियां, लडकियां, बहनें तो अकबर की खिदमत में भेजनी पड़ती ही थीं ताकि बादशाह सलामत उनको भी सलामत रखें, और साथ ही अकबर महान के पैरों पर डाला गया पानी भी इनको पीना पड़ता था जैसा कि ऊपर बताया गया है।
अकबर शराब और अफीम का इतना शौक़ीन था, कि अधिकतर समय नशे में धुत रहता था।
अकबर के दो बच्चे नशाखोरी की आदत के चलते अल्लाह को प्यारे हो गये।
हमारे फिल्मकार अकबर को सुन्दर और रोबीला दिखाने के लिए रितिक रोशन जैसे अभिनेताओं को फिल्मों में पेश करते हैं परन्तु विन्सेंट स्मिथ अकबर के बारे में लिखते हैं-
“अकबर एक औसत दर्जे की लम्बाई का था। उसके बाएं पैर में लंगड़ापन था। उसका सिर अपने दायें कंधे की तरफ झुका रहता था। उसकी नाक छोटी थी जिसकी हड्डी बाहर को निकली हुई थी। उसके नाक के नथुने ऐसे दिखते थे जैसे वो गुस्से में हो। आधे मटर के दाने के बराबर एक मस्सा उसके होंठ और नथुनों को मिलाता था।
अकबर का दरबारी लिखता है कि अकबर ने इतनी ज्यादा पीनी शुरू कर दी थी कि वह मेहमानों से बात
करता करता भी नींद में गिर पड़ता था। वह जब ज्यादा पी लेता था तो आपे से बाहर हो जाता था और पागलों जैसी हरकतें करने लगता।
अकबर महान के खुद के पुत्र जहाँगीर ने लिखा है कि अकबर कुछ भी लिखना पढ़ना नहीं जानता था पर यह दिखाता था कि वह बड़ा भारी विद्वान है।
अकबर ने एक ईसाई पुजारी को एक रूसी गुलाम का पूरा परिवार भेंट में दिया। इससे पता चलता है कि अकबर गुलाम रखता था और उन्हें वस्तु की तरह भेंट में दिया और लिया करता था।
कंधार में एक बार अकबर ने बहुत से लोगों को गुलाम बनाया क्योंकि उन्होंने १५८१-८२ में इसकी किसी नीति का विरोध किया था। बाद में इन गुलामों को मंडी में बेच कर घोड़े खरीदे गए ।
अकबर बहुत नए तरीकों से गुलाम बनाता था। उसके आदमी किसी भी घोड़े के सिर पर एक फूल रख देते थे। फिर बादशाह की आज्ञा से उस घोड़े के मालिक के सामने दो विकल्प रखे जाते थे, या तो वह अपने घोड़े को भूल जाये, या अकबर की वित्तीय गुलामी क़ुबूल करे।
जब अकबर मरा था तो उसके पास दो करोड़ से ज्यादा अशर्फियाँ केवल आगरे के किले में थीं। इसी तरह के और
खजाने छह और जगह पर भी थे। इसके बावजूद भी उसने १५९५-१५९९ की भयानक भुखमरी के समय एक सिक्का भी देश की सहायता में खर्च नहीं किया।
अकबर के सभी धर्म के सम्मान करने का सबसे बड़ा सबूत-
अकबर ने गंगा,यमुना,सरस्वती के संगम का तीर्थनगर "प्रयागराज" जो एक काफिर नाम था को बदलकर इलाहाबाद रख दिया था। वहाँ गंगा के तटों पर रहने वाली सारी आबादी का क़त्ल करवा दिया और सब इमारतें गिरा दीं क्योंकि जब उसने इस शहर को जीता तो वहाँ की हिन्दू जनता ने उसका इस्तकबाल नहीं किया। यही कारण है कि प्रयागराज के तटों पर कोई पुरानी इमारत नहीं है। अकबर ने हिन्दू राजाओं द्वारा निर्मित संगम प्रयाग के किनारे के सारे घाट तुड़वा डाले थे। आज भी वो सारे साक्ष्य वहाँ मौजूद हैं।
२८ फरवरी १५८० को गोवा से एक पुर्तगाली मिशन अकबर के पास पंहुचा और उसे बाइबल भेंट की जिसे इसने बिना खोले ही वापस कर दिया।
4 अगस्त १५८२ को इस्लाम को अस्वीकार करने के कारण सूरत के २ ईसाई युवकों को अकबर ने अपने हाथों से क़त्ल किया था जबकि इसाईयों ने इन दोनों युवकों को छोड़ने के लिए १००० सोने के सिक्कों का सौदा किया था। लेकिन उसने क़त्ल ज्यादा सही समझा ।
सन् 1582 में बीस मासूम बच्चों पर भाषा परीक्षण किया और ऐसे घर में रखा जहाँ किसी भी प्रकार की आवाज़ न जाए और उन मासूम बच्चों की ज़िंदगी बर्बाद कर दी वो गूंगे होकर मर गये । यही परीक्षण दोबारा 1589 में बारह बच्चों पर किया ।
सन् 1567 में नगर कोट को जीत कर कांगड़ा देवी मंदिर की मूर्ति को खण्डित की और लूट लिया फिर गायों की हत्या कर के गौ रक्त को जूतों में भरकर मंदिर की प्राचीरों पर छाप लगाई ।
जैन संत हरिविजय के समय सन् 1583-85 को जजिया कर और गौ हत्या पर पाबंदी लगाने की झूठी घोषणा की जिस पर कभी अमल नहीं हुआ।
एक अंग्रेज रूडोल्फ ने अकबर की घोर निंदा की।
कर्नल टोड लिखते हैं कि अकबर ने एकलिंग की मूर्ति तोड़ डाली और उस स्थान पर नमाज पढ़ी।
1587 में जनता का धन लूटने और अपने खिलाफ हो रहे विरोधों को ख़त्म करने के लिए अकबर ने एक आदेश पारित किया कि जो भी उससे मिलना चाहेगा उसको अपनी उम्र के बराबर मुद्राएँ उसको भेंट में देनी पड़ेगी।
जीवन भर इससे युद्ध करने वाले महान महाराणा प्रताप जी से अंत में इसने खुद ही हार मान ली थी यही कारण है कि अकबर के बार बार निवेदन करने पर भी जीवन भर जहाँगीर केवल ये बहाना करके महाराणा प्रताप के पुत्र अमर सिंह से युद्ध करने नहीं गया की उसके पास हथियारों और सैनिकों की कमी है..जबकि असलियत ये थी की उसको अपने बाप का बुरा हश्र याद था।
विन्सेंट स्मिथ के अनुसार अकबर ने मुजफ्फर शाह को हाथी से कुचलवाया। हमजबान की जबान ही कटवा डाली। मसूद हुसैन मिर्ज़ा की आँखें सीकर बंद कर दी गयीं। उसके 300 साथी उसके सामने लाये गए और उनके चेहरों पर अजीबोगरीब तरीकों से गधों, भेड़ों और कुत्तों की खालें डाल कर काट डाला गया।
मुग़ल आक्रमणकारी थे यह सिद्ध हो चुका है। मुगल दरबार तुर्क एवं ईरानी शक्ल ले चुका था। कभी भारतीय न बन सका। भारतीय राजाओं ने लगातार संघर्ष कर मुगल साम्राज्य को कभी स्थिर नहीं होने दिया। राजपूताना ने मुगलों को कभी स्वीकार नहीं किया।गुजरात, मालवा, मराठा, बिहार, बंगाल, असम तथा दक्षिण का कोई प्रदेश कभी भी मुगलों के पूर्ण अधिकार में नहीं रहा।
फिर भी कुछ चापलूस लोग अकबर को शहंशाहे हिन्द कहते हैं।